तीन देवियां

न्यूजीलैंड, फिनलैंड और डेनमार्क… इन तीनों देशों में बहुत सी भौगोलिक, सांस्कृतिक व सामाजिक समानताएं हो सकती हैं. लेकिन, यहाँ हम ​जिस समानता की बात कर रहे हैं, वो है इनकी राष्ट्राध्यक्षों के बारे में.ये तीनों ही देश ऐसी युवा महिलाओं द्वारा संचालित हो रहे हैं, जो परंपरागत नेताओं से काफी अलग हैं. अपनी युवा ऊर्जा के साथ, इनके आचरण में जिस तरह खुद से ज्यादा देश और देश की जनता की भलाई का जज्बा दिख रहा है, वह दूसरे किसी भी देश की जनता के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है.

ताजा खबर है कि डेनमार्क की प्रधान मंत्री मेट फ्रेड्रिक्सन ने देशहित को सर्वोपरि बताते हुए अपनी शादी को तीसरी बार स्थगित कर दिया है. जिसकी वजह जुलाई मध्य में यूरोयिन काउंसिल की ब्रुसेल्स में होने वाली बैठक है, जिसमें मेट को भाग लेना है. 42 वर्षीय मेट ने पिछले साल 27 जून को यह पद संभाला था, उनका पहला साल कल पूरा हो रहा है. मेट और उनके मंगेतर बो ठनबर्ग पिछले छह साल से रिलेशन में हैं.

इसके बाद बारी आती है, तीन साल पहले न्यूजीलैंड की 40 वीं प्रधानमंत्री बनी जेसिंडा अर्डर्न की, जो अगले महीने 26 जुलाई को 40 साल की होने वाली हैं. कोरोना संकट से निपटने की उनकी चार चरण की नीति ने न सिर्फ इस महीने की 9 तारीख को न्यूजीलैंड को दुनिया का पहला कोरोनामुक्त देश बनाया, बल्कि उन्हें भी विश्व भर की सराहना का पात्र बनाया. इससे पहले वह वीआईपी संस्कृति का हिस्सा न बनाते हुए, आम लोगों के बीच घुल—मिलकर रहने की अपनी शैली की वजह से काफी लोकप्रिय हैं. पिछले साल एक मस्ज्दि पर हुए हमले में मारे गए लोगों के परिवारों के बीच वह किस तरह हमदर्दी जताने पहुँची थीं, उससे उनकी छवि एक बहुत संवेदनशील और सहज महिला के रूप में स्थापित हुई थी.

हालांकि एक सप्ताह से देश में फिर से कोरोना के नए मामले सामने आने से उनकी छवि का थोड़ा सा धक्का जरूर लगा है, और उनके कार्यकाल में देश में हेट क्राइम के बढ़ते मामले भी उनके सामने एक बड़ी चुनौती हैं. जिसकी वजह से जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता और विश्वसनीयता में थोड़ी सी कमी आई है. 19 सितंबर को होने वाले चुनावों से पहले के सर्वेक्षणों में पिछले महीने उन्हें 59 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिला था, जबकि मुख्य विपक्षी दल नेशनल पार्टी को 29 प्र.श. का. कल के सर्वे के नतीजे बताते हैं कि उनके समर्थकों की तादाद 9 फीसदी घट गई है और नेशनल पार्टी को 38 प्र.श. लोगों ने प्राथमिकता दी है. यह उनके लिए चिंता का विषय हो सकता है.

जहाँ तक फिनलैंड की पीएम सना मारिन का सवाल है तो वह अपनी खूबसूरती, जहीनियत को लेकर तो तारीफ पाती ही हैं, साथ ही उनके नाम विश्व की सबसे कम उम्र पीएम का भी खिताब दर्ज है. वह सिर्फ 34 साल की उम्र में देश की प्रधानमंत्री बनी हैं. कोरोना संकट के दौरान उनकी भूमिका दुनिया भर में काफी सराही गई है. उन्होंने पिछले साल दिसंबर में ही यह पदभार संभाला और तभी उनके सामने कोरोना की चुनौती आ खड़ी हुई. इसके बावजूद उन्होंने चुनौती का सामना बड़ी कुशलता के साथ किया और समय रहते ही वह सब कुछ किया, जो जरूरी था. उन्होंने कोरोना का पहला मामला सामने आते ही लोगों को तथ्यपरक जानकारियों द्वारा जागरूक किया और समाज के हर वर्ग में कोरोना को लेकर ज्यादा से ज्यादा जागरुकता फैलाने के लिए कहा. साथ ही उन्होंने समय रहते स्कूलों, म्यूजियम, पुस्तकालयों और सार्वजनिक सभा स्थलों जैसी भीड़-भाड़ वाली जगहों को बंद करने का आदेश दे दिया था, जिससे फिनलैंड सबसे कम नुकसान वाला यूरोपीय देश बना. इससे पहले वह सप्ताह में तीन दिन छुट्टी और प्रतिदिन छह घंटे काम के अपने फार्मूले को लेकर भी चर्चा में रही हैं. करीब ढाई साल की बेटी की माँ सना के जीवन का एक और रोचक पहलू यह है कि वे एक समलिंगी पैरेंट्स की संतान हैं. उनका पूरा पालन—पोषण उनकी माँ और उसकी समलिंगी पार्टनर ने मिलकर किया है. इस रिश्ते पर कुछ कहने को लेकर वे बचपन में काफी संकोची रही हैं.

ये तीनोंं महिला प्रधानमंत्री एक बदलती दुनिया की वायस हैं और एक ऐसे समाज की उम्मीद जगाती हैं, जिसका निर्माण आपसी सामंजस्य, दूरगामी सोच और सकारात्मकता की नींव पर होगा.

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