उम्मीद और हताशा की वैक्सीन

शरीर में ट्रायल वैक्सीन का जाना खतरनाक है, लेकिन सब लोग डरेंगे तो वैक्सीन कैसे बनेगा, यह कहना है 36 साल के ब्रिटिश युवक जाॅन ज्यूक्स का, जो उन 500 वाॅलंटियर्स में से एक हैं, जिन्होंने मानवता की भलाई के लिए कोरोना की वैक्सीन के ट्रायल के लिए अपने आप को पेश करने का जोखिम उठाया है. ऐसा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, ऐसा सोचने वाले वाॅलंटियर्स की वैश्विक संख्या हजारों में हो सकती है. सौ से ज्यादा संस्थान कोरोना से बचने का वैक्सीन खोजने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं. कुछ देशों ने इसे बना लेने का दावा भी किया है, कुछ का कहना है कि यह जुलाई तक बाजार में आ जाएगी, तो कुछ इसे सितंबर तक लाने की बात कर रहे हैं, तो कुछ साल के अंत तक.


ऐसे वक्त में जब कोरोना से संक्रमित देशों मेें करीब 75 फीसदी अपने यहाँ लाॅकडाउन खत्म करने की घोषणा कर चुके हैं, एक ऐसी वैक्सीन जो कोरोना से बचा सके, उम्मीद के लिए एक बहुत बड़ा संबल हो सकती है. लेकिन, पिछले दो महीने से चल रहे लाॅकडाउन को और ज्यादा लंबे समय तक नहीं खींचा जा सकता. इसलिए वैक्सीन का इंतजार करते हुए और सावधानियां बरतते हुए अपने पुराने जीवन ढर्रे पर लौटने की जद्दोजहद में लगी दुनिया के सामने इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि वह इस बात पर विश्वास करे कि ऐसी वैक्सीन जल्दी ही लोगों की पहुँच में होगी और किसी जादू की छड़ी की तरह, हजारों लोगों की जानें लील लेने वाले कोरोना नामक दानव का खात्मा कर देगी, जैसा कि दावा किया जा रहा है.
लेकिन विश्वास में सेंध लगाने का काम करती हैं ऐसी खबरें, जिनमें कहा जाता है कि अब लोगों को कोरोना के साथ जीने की आदत डाल लेनी होगी, जैसे कि हम टीबी, एचआईवी, डायबिटीज, डेंगू, स्वाइन फ्लू या हाइपर टेंशन जैसी चीजों के साथ जी रहे हैं. विश्व बैंक की प्रमुख वैज्ञाानिक स्वामीनाथन ने एक साक्षात्कार में चेताया है कि कोरोना वायरस इतना व्यापक हो चुका है कि अब यह हमेशा हमारे साथ रहने वाला है.
इतिहास गवाह है कि वैक्सीन किसी भी समस्या का स्थाई समाधान नहीं है. अनेक बीमारियों के टीके बनने और लोगों को लगने के बावजूद वे बीमारियाँ आज भी लोगों को अपना शिकार बना रही हैं. चिकित्सा विज्ञान निरंतर उन्नत हो रहा है, नई-नई खोजें हो रही हैं और नए-नए समाधान खोजे जा रहे हैं, लेकिन इसके समानानंतर नई-नई बीमारियां और वायरस भी पनप रहे हैं.
कोरोना से छुटकारा दिलाने वाली वैक्सीन अगर आ भी जाए तो समाज के आखिरी पायदान पर खड़े आम आदमी तक उसकी पहुँच सुनिश्चित करते-करते भी लंबा समय लग जाएगा. और तब भी इसे लेकर कतई आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता कि तब तक कोई और बीमारी या वायरस अपना सिर नहीं उठा चुका होगा.
कहा जा रहा था कि कोरोना दुनिया में बहुत कुछ बदल देगा. लेकिन, देखना यह है कि हमने ऐसे किसी भी भावी खतरे से महफूज रखने के लिए स्वयं को कितना बदला है. जीवन और जीविका के सवालों के बीच झूलते हुए, हमने कभी भी जीवन शैली को बदलने या सुधारने की पैरवी नहीं की है. अगर हम इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि कोरोना हमारी ही सामूहिक गलतियों की तो देन है तो क्या हम खुद को लेकर इतना आश्वस्त हो सकते हैं कि हम भविष्य में उन्हीं गलतियों को फिर से नहीं दोहराएंगे?

Filed in: Editor's Notes

You might like:

डाॅन्ट मिस इट… डाॅन्ट मिस इट…
एफएक्सगुरू : मूवी एफएक्स डायरेक्टर एफएक्सगुरू : मूवी एफएक्स डायरेक्टर
दुश्मन नं. 2 दुश्मन नं. 2
ओटीटी भी ओके ओटीटी भी ओके
© A touch of tomorrow !. All rights reserved. XHTML / CSS Valid.
Proudly designed by Theme Junkie.