कहानियों का समंदर

1. राजा का सम्मान

एक बार एक राजा अपने दरबार में बैठा दरबारियों से बातचीत कर रहा था. इतने में उसके एक प्रिय दरबारी की जेब से सिक्का गिरकर फर्श पर जा गिरा. वह बहुत गरीब था और उसके पास यही एक सिक्का बचा था. वह तुरंत फर्श पर बैठकर अपना सिक्का ढूंढने लगा. अन्य दरबारी, जो उसकी चतुराई और राजा के उसके प्रति विशेष स्नेह की वजह से उससे ईर्ष्या रखते थे, यह देखकर राजा को उसके खिलाफ भड़काने की कोशिश करने लगे. एक ने कहा कि आपने अब तक इसे कितने कीमती-कीमती उपहार दिए, पर यह इतना अशिष्ट है कि आपकी बात से ज्यादा अहमियत एक सिक्के को दे रहा है. राजा को भी यह बात बुरी लगी. उसने उस दरबारी से पूछा कि क्या तुम्हारे लिए एक सिक्का हमसे ज्यादा महत्व रखता है. इस पर वह दरबारी बोला, ‘‘महाराज, आप गलत समझ रहे हैं. मैं सिक्का इसलिए ढूंढ रहा हूँ कि उस पर आपका चित्र उत्कीर्ण है. और मैं नहीं चाहता कि उस पर लोगों के पैर पड़ें. राजा उसके उत्तर से बहुत खुश हुआ और अपनी उंगली से निकालकर एक हीरे की अंगूठी उसे इनाम में दी.

सारः जो चतुर होते हैं, वे संकट को भी अवसर में बदल देते हैं.

2. थप्पड़ की कीमत

एक दिन एक ग्रामीण पड़ोस के गाँव में गया हुआ था. वह वहाँ बाजार में टहल रहा था कि अचानक ही एक अजनबी उसके सामने आ गया और उसके गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया. इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, अजनबी तुरंत हाथ जोड़कर बोला, “मुझे माफ कर दें! मुझे लगा कि आप मेरे पुराने दोस्त हैं.” ग्रामीण को उसकी इस सफाई पर यकीन नहीं हुआ और वह अजनबी को अपने साथ गाँव के मुखिया के सामने ले गया और उससे इस बात की शिकायत की. मुखिया उस अजनबी का रिश्तेदार था. उसके इशारे पर अजनबी ने अपनी गलती कबूल कर ली और मुखिया ने फैसला सुनाया कि अपराधी ने अपनी गलती कबूल मान ली है, इसलिए मैं उसे जुर्माने के तौर पर पीड़ित को एक रुपया अदा करने का आदेश देता हूँ. अगर उसके पास इस समय एक रुपया नहीं हो तो वह घर से लेकर आ सकता है. ग्रामीण भांप गया कि मुखिया अजनबी को बचा रहा है. पर वह कर भी क्या सकता था.फैसला सुनकर अजनबी रुपया लाने के लिए चला गया. ग्रामीण ने बहुत देर तक उसका इंतजार किया, लेकिन अजनबी वापस नहीं आया. उकताकर उसने मुखिया से पूछा कि क्या उसे ऐसा लगता है कि राह चलते किसी को बेवजह थप्पड़ मार देने के लिए एक रुपए का जुर्माना पर्याप्त दंड है. इस पर मुखिया ने कहा कि हाँ, इससे ज्यादा सजा तो अन्याय हो जाएगी. इस पर ग्रामीण ने तुरंत मुखिया के गाल पर एक थप्पड़ रसीद किया और बोला कि श्रीमान, अब जब वह रुपया लेकर आ जाएगा तो आप वह रुपया अपने पास रख लेना. और फिर वह वहाँ से चला गया.

सारः न्याय की कुर्सी पर बैठने के बाद पक्षपात नहीं करना चाहिए.

3. कंगन की वापसी

एक पंचायत में एक अजीब मामला आया. हुआ यह कि करीब दस साल पहले गाँव का एक व्यापारी शहर में कारोबार करने के लिए अपने साहूकार मित्र से धन उधार लेकर गया था. धरोहर के रूप में उसने एक कंगन, जो उसकी स्वर्गवासी माँ की निशानी के रूप में संजोकर रखा गया था, मित्र को रखने के लिए दे दिया और बोला कि वह दस साल बाद लौटेगा तो उसका धन चुकाकर अपना कंगन छुड़ा लेगा. मित्र ने कहा भी कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है पर वह नहीं माना. साहूकार ने स्नेहवश वह कंगन अपनी बच्ची के हाथ में पहना दिया, दस साल बाद व्यापारी वापस लौटा और मित्र का धन, मय सूद के, लौटाकर अपना कंगन माँगा. साहूकार ने बेटी को, जो दस सालों में एक युवती बन चुकी थी, बुलाया और कंगन देने के लिए कहा. बेटी ने काफी कोशिश की, लेकिन कंगन उसके हाथ से नहीं निकला. साहूकार ने मित्र को कहा कि वह इतने वजन को सोना ले ले. व्यापारी बोला कि बात सोने की नहीं है, इसके भावनात्मक महत्व की है. साहूकार ने कंगन को काटकर निकलवाने की बात की तो व्यापारी और भड़क गया कि वह अपनी माँ की आखिरी निशानी को कैसे खराब होने दे सकता है. जब मामला पंचायत के पास पहुँचा तो सारे पंच भी दुविधा में पड़ गए कि आखिर इस समस्या का हल कैसे निकले. आखिर उनमें से एक को उपाय सूझा, उसने व्यापारी से कहा कि देखो तुम्हारा एक विवाह योग्य बेटा है, यदि तुम उसकी शादी साहूकार की बेटी से करना स्वीकार कर लो तो कंगन तुम्हें वापस मिल जाएगा. व्यापारी तो तैयार हो गया, लेकिन साहूकार आनाकानी करने लगा. इस पर सरपंच ने कहा कि तब तो तुम्हारी बेटी का हाथ काटकर कंगन निकालना पड़ेगा. अब तुम ही तय करो कि उसका हाथ कटवाओगे या इनके पुत्र के हाथ में दोगे. कोई और चारा न पाकर साहूकार ने भी अपनी स्वीकृति दे दी.

सारः सूझबूझ से काम लिया जाए तो असाध्य समस्याओं का भी समाधान संभव है.

4. पानी पीने तक

एक बार एक राज्य पर उसके शत्रु राज्य ने आक्रमण कर दिया. उसके सिपाही बहुत बहादुरी से लड़े और शत्रु सेना को पराजित कर दिया. शत्रु सेनापति उनकी गिरफ्त में आ गया. उसे राजा के सामने लाया गया तो राजा ने उसे मारने का आदेश दिया. सेनापति बोला कि मुझे मरने से पहले थोड़ा पानी मिल जाए तो मैं आपका बहुत आभारी रहूँगा. राजा ने उसकी यह इच्छा मान ली और उसके लिए पानी मंगाया. सेनापति पानी का गिलास हाथ में लिए खड़ा था और थरथर कांप रहा था. इस पर राजा बोला कि तुम आराम से पानी पी लो. मैं वचन देता हूँ कि जब तक तुम पानी नहीं पी लोगे, तुम्हें कोई नहीं मारेगा. यह सुनकर सेनापति के चेहरे पर चमक आ गई और उसने गिलास एक ओर रख दिया और बोला कि मैं अब पानी नहीं पीने वाला. आप चाहें तो अपना वचन तोड़कर मुझे मरवा सकते हैं. यह सुनकर राजा को हँसी आ गई और बोला कि तुम्हारे जैसे चतुर व्यक्ति को तो मेरी सेना में होना चाहिए था. मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ.

सारः जो संकट के समय भी धैर्य न खोए, वही उससे बचने में सफल होता है.

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