सोनभद्र Express

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ऐतिहासिक कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध है लखनिया दरी

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सोनभद्र सोनभद्र जिले के सुकृत से कुछ की दूरी पर स्थित है लखनिया दरी अपनी अपनी ऐतिहासिक कलाकृतियों के लिए एक अत्यंत प्रसिद्ध स्थल है। यह स्थान पहाड़ो के बीच बसे गुफाओ के लिए भी प्रसिद्ध है। जहाँ हम अनेक प्रकार के पहाड़ी चित्रो से भी अवगत होते है। पहाड़ी गुफाओं में बने इन घोड़े और पालकी के ऐतिहासिक चित्रो को हम “कोहबर” नाम से जानते है। यहां घूमने के लिए सावन माह (जुलाई-अगस्त) अत्यंत उत्तम समय है।सावन के महीने में  आस पास के जिले से व अन्य प्रदेशो से आने वाले सैलानियो के लिए एक अत्यंत पसंदीदा स्‍थल होता है।

by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

कितने इतिहास छुपाये हुये है गुप्‍तकाशी

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सोनभद्र (18/10): सोनभद्र के शिवद्वारा क्षेत्र में ​​​​​पुरातात्विक खोजाे के कारण प्रसिद्ध बेलन घाटी में खुदाई या खेती के दौरान मिल रही मूर्तियां लोगों के लिए कौतुहल का विषय है। आज यह क्षेत्र गुप्‍तकाशी के नाम से प्रसिद्व है। जो न जाने कितने इतिहास को अपने अन्‍दर छुपाये हुये है। इस इलाके मे खुदाई के दौरान हर रोज सैकडों साल पुरानी मूर्तियां मिलती है। कई लोंग खुदाई दौरान प्राप्‍त मूर्तियों को संग्रहालय में रखने की जगह अपने घरो में रखते है। इन मूतियों का संरक्षण के अभाव में यत्र-तत्र रखी हुई सैकडों मूतियां नष्‍ट होने के कगार पर है। इतिहासकार कहते है कि सबसे पहले आदिमानवों का बसाव सोनभद्र से निकलने वाली और यहां बहने वाली बेलन नदी घाटी में हुआ.

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इतिहासकार बताते है कि बेलन घाटी की सभ्‍यता दुनियां भर में सबसे पुरानी मनी गई है। बेलन घाटी पर रिहंद बाध बनाने के दौरान खुइाई में मिले अवषेश को पाषाण काल की सभ्‍यता से भी पुरानी बताई गई। यहां रहने के लिए गुफा थी, पहनने के लिए खाल और छाल तथा खाने को वन संपदा अौर शिकार प्रचुर मात्रा में उपलब्‍ध था। इतना ही नहीं इतिहासकार इस संबंध में कहते है कि यही कैमूर श्रृखलाओं से सर्वप्रथम प्रागैतिहासिक चित्रकला की खोज प्रारंभ हुई चित्रांकन और रेखांकन मनुष्‍य जाति की सबसे प्राचीन कला हैं। आदि मानव गुफाओं की दीवारों का प्रयाेग के कैनवास के रूप में किया करते थे। जब भाषा का ज्ञान नहीं था, लिपि का विकास नही हुआ था, उस समय जाने -अनजाने अादिमानवों ने अपने कालखंड का समूचा इतिहास चित्रों के माध्‍यम से उकेर दिया। बेलन की संस्‍कृति लगभग सवा लाख वर्श प्राचीन है। इसकी घाटियो में अनेक शैलचित्र उपलब्‍ध है।जिसमें मुक्‍खा फाल का शैल चित्र गुहाचित्र सर्वाहिक प्रसिद्व है।

by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

कला-संस्कृति को समेटे हैं प्राचीन गुफाएं

माड़ा की गुफाएं

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सोनभद्र (15/10): प्राकृतिक सुन्‍दरता से भरपूर यूपी का सोनभद्र जिला राज्य का र्भौगौलिक क्षेत्र मे दूसरा सबसे बड़ा जिला है। यह जिला, सांस्‍कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को अपने आप में समेटे है। यहां की गुफाओं से रामायण काल की यादें जुड़ी है। अनपरा से महज चालीस से पचास किमी की दूरी पर रामायण काल के जीवंतता की जीती-जागती प्रमाण माड़ा की गुफाएं है।

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जिला सोनभद्र  धार्मिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से काफी समृद्ध है।  यह जिला, सांस्‍कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को अपने आप में समेटे है। यहां की गुफाओं से रामायण काल की यादें जुड़ी है। अनपरा से महज चालीस से पचास किमी की दूरी पर रामायण काल के जीवंतता की जीती-जागती प्रमाण माड़ा की गुफाएं है। माड़ा की गुफाएं सातवीं-आठवीं सदी की शैलोत्कीर्ण रॉक कट गुफाएं हैं जिनकी तुलना अजंता और एलोरा की गुफाओं से की जाती है। यहा की मान्यता है कि रावण ने मंदोदरी के साथ इन्हीं गुफाओं में गंधर्व विवाह रचाया था। रावण माड़ा नामक गुफा में नटराजन की नृत्य करती मूर्ति, पत्थर ढोते वानरों के चित्र, देवी देवताओं के चित्र के साथ बने रहन सहन कक्ष भी प्राचीन सभ्यता की कहानी अपने अाप कहते नजर आते हैं।

प्राचीन काल की  250 रॉक  चित्र

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सोनभद्र जिला , गुफा पेंटिग्‍स  के लिए बहुत विख्‍यात है। यहां प्राचीन काल की काफी चित्रकलाएं आज भी देखने को मिलती है। यह पेंटिग्‍स, विंध्‍य और कैमूर पर्वतमाला की गुफा आश्रयों में स्थित है। यहां लगभग  250 रॉक कलाएं होगी।  यहां की कुछ उल्‍लेखनीय पेंटिग्‍स है लेखनिया, पंचमुखी, काउवा खोह और लखमा में स्थित है। यह चित्र, मध्‍यपाषाण काल से सौरपाषाण काल तक की अवधि पर प्रकाश डालती हैं। जबकि, पंचमुखी गुफाएं , रॉबर्ट्सगंज से  8 किमी. औरऔर लेखनिया गुफाएं 22 किमी. की दूरी पर स्थित हैं, वहीं काउवा खोह और लखमा गुफा, चारूक के नजदीक स्थित है यह  मउ कलां गांव के पास हैं। इन स्‍थलों में से, काउआ खोह रॉक शेल्‍टर, खोडवा पहाड़ में स्थित है जो रॉक पेंटिग्‍स का सबसे बड़ा अड्डा और प्रर्दशन स्‍थल है। इन गुफाओं में स्थित चित्र, उस काल की संस्‍कृति और कला को बखूबी बयां करती है ।

by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

अमिला धाम में लगता है आदिवासियों का मेला 

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सोनभद्र (13/10):  सोनभद्र के नगवां ब्लाक के चकरिया जंगल के नजदीक अमिला धाम लोगों के आस्था का केंद्र है। वासंतिक और शारदीय नवरात्र में क्षेत्र के आदिवासियों का यहां मेला लगता है। मनौती पूरी होने पर लोग पशु बलि देते हैं। समाज के मुख्य धारा से कटे और एक प्रतिबंधित संगठन के कारकून भगवती के दर्शन पूजन के लिए जाते हैं। आदिवासियों का नवरात्र में यह प्रमुख तीर्थ स्थल है। मान मनौती ओझइती, झाड़ फूंक समेत सांग लगाने तक की क्रिया पूरी की जाती है। नवरात्र भर यहां मेला लगा रहता है। श्रद्धालुओं को इस तीर्थ स्थल तक पहुंचने के लिए सुविधाओं का अभाव है। नक्सल बेल्ट होने के कारण भय का वातावरण भी बना रहता है। तमाम समस्याओं के बाद भी मां के दरबार में माथा टेकने के लिए सैकड़ों श्रद्धालु तड़के पहुंचे। यहां पर मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

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भौतिक एवं आध्यात्मिक महत्व वाला रेणुकेश्वर महादेव मंदिर 

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सोनभद्र (08/10):  रेणुकेश्‍वर महादेव मंदिर, सोनभद्र जिले में रेणुकूट में स्थित एक भव्य मंदिर है।रेणुकेश्वर महादेव मंदिर का महत्व भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों रूप से सुंदर है। यह मंदिर रेनुकूट के प्रमुख स्थानों में से एक है। रेणुकेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण वर्ष 1972 में बिड़ला जी द्वारा करवाया गया था। रेणुकूट मुख्य सड़क एक ओर हिंडाल्को कारखाना स्थित है । यह मंदिर अत्यंत सुन्दर एवं मन मोहक है, जो भक्तों को बार-बार अपनी ओर आकर्षित करती है। मंदिर अपने आप में “आध्यात्मता और भौतिकता” दोनों को एक साथ समेंटे हुए है, मंदिर की मूर्ति कला अति उत्तम है। बाहरी एवं भीतरी सतहों पर बनें चित्र एवं मूर्तियाँ बहुत सुन्दर, अद्भुत एवं अद्वितीय है।

मां वैष्णो शक्तिपीठ धाम मंदिर

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सोनभद्र (08/10): या देवी सर्वभूतेषु सुष्टि रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम: मंत्र से समूचा इलाका गुंजायमान हो उठा। यह मंदिर सोनभद्र  जिले के प्रसिद्ध मंदिरों में मां वैष्णो शक्तिपीठ धाम मंदिर का स्थान विशिष्ट है। यह वाराणसी-शक्तिनगर मुख्य मार्ग पर बारी-डाला क्षेत्र में स्थित है।वर्ष 2004 में जम्मू स्थित कटरा से मां वैष्णो की अखंड ज्योति एक सप्ताह में लाई गई थी और शारदीय नवरात्र में मां जगदंबा के सभी विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी। जम्मू से लाया गया अखंड ज्योति आजतक अनवरत जलता आ रहा है। जनपद से ही नहीं बल्कि बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश व अन्य प्रदेशों से भी श्रद्धालु हमेशा दर्शन के लिए आते रहते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन मांगी गई हर मुराद मां जरूर पूरा करती हैं। यहां नवरात्र में लाखों की संख्या में भक्त दर्शन करने दूर दराज से आते है.

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जनपद की 70% आदिवासी आबादी वन उपज से करती है जीवनयापन

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सोनभद्र (01/10) : इस जनपद की सत्तर प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। आदिवासियों के रहन-सहन, रीतिरिवाज और खान-पान को लेकर जुड़ी अनोखी प्रथाओं है। यहां की प्रमुख आदिवासी जातियों में गोंड, खरवार, पन्निका, भुइयां, बैगा, चेरो, घसिया, धरकार और धनुआर हैं। यहां के अधिकांश आदिवासी गांवों में रहते हैं और जीवनयापन के लिए जंगलों पर आश्रित हैं। वे तेंदू के पत्ते जमा करते हैं, जिनसे बीड़ी बनायी जाती है। इसके अलावा वे शहद व अन्य औषधीय पौधों को स्थानीय बाजार में बेचते हैं। कुछ आदिवासियों के पास छोटी खेतों  की जमीन भी है जिसमें वे चावल, गेहूं के अलावा सब्जियां उपजाते हैं।

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पर्यटकों को आकर्षित करता है मुक्खा

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सोनभद्र  का मुक्खा झरना, रॉबर्ट्सगंज – घोरवाल – मुखदारी सड़क पर स्थित है । जहा पहाडियों के बीच झरने प्राकृतिक नज़ारे जो देखते ही बनते है। यह फाल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहाँ पर्यटकों का काफी आना जाना रहता है। यहाँ की दुर्गम पहाड़िया, पहाड़ो से गिरते झरने जो प्रकति ने जैसे अपने हाथो से बनाया हो। यह एक बहुत खूबसूरत वाॅटर फाॅल जहाँ से आपका वापस जाने का मन नही करेगा।

 कंडाकोट के अर्धनारीश्वर

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सोनभद्र- जिला मुख्यालय से आठ किमी की दूरी पर बहुआर में स्थित कंडाकोट की पहाड़ी पर  भगवान शिव व माता पार्वती की प्रतिमा है। इन्हें गिरिजा शंकर के नाम से जाना जाता है।

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ऐसी मान्यता है कि यहीं पर कण्व ऋषि की तपोस्थली है। यहां के पहाड़ में दो ऐसी गुफाएं हैं जहां हजारों साल पुराने भित्ति चित्र बने हैं। सबसे पुरानी चित्रकला में बने विभिन्न तरह के चित्र यहां पहुंचने वाले लोगों के लिए आकर्षण के केंद्र होते हैं।

by Omprakash Kushwaha from Sonbhadra (UP) – 231216

मां ज्वालामुखी मंदिर की महिमा

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सोनभद्र- शारदीय नवरात्र मे जहां देशभर के श्रृद्धालु वैष्णो देवी धाम  से लेकर सभी शक्ति पीठो मे के दर्शन कर पूजा पाठ करते है वही शक्ति नगर सोनभद्र मे विराजमान ज्वालामुखी की महिमा भी अपार है। नवरात्र की शुरू आत प्रति पदा से लेकर सप्तमी तक रोजाना भोर से ही भक्तो का तांता मंदिर परिसर मे लगती है। इतिहासकारो के अनुसार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड. व बिहार पांच प्रदेशो की सीमा पृ स्थित मां ज्वालामुखी मंदिर रिहन्द जलाशय मे समाहित गहरवार राजा उदित नारायण के राज घराने की कुल देवी के रूप मे उनके द्बारा स्थापित की गई थी। आज भी सिगरौली जिले मे रह रहे इस राजघरानों के लोग माँ ज्वालामुखी को कुल देवी के रूप मे पूजा करते है।

महुअरिया के जंगल में

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सोनभद्र- सोनभद्र के  प्रतिबंधित कैमूर वन्य जीव विहार क्षेत्र महुअरिया के जंगल में ब्लैक बक (काले हिरन) पाये जाते है। यह पर चकारा,  नीलगाय व  भालू भी पाये जाते है।

 वीर राजा लोरिक के शौर्य का प्रतीक शिलाखंड

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सोनभद्र- राबर्ट्सगंज से शक्तिनगर मुख्यमार्ग पर मात्र 6 किमी दूरी पर स्थित है वीर लोरिक पत्थर, एक विशालकाय दो टुकड़ो में खंडित पत्थर, जिस पत्थर को यादवों के वीर अहीर राजा लोरिक ने तलवार के एक ही प्रहार से विभक्त कर दिया था, जो सहज ही यात्रियों – पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है और इसके इतिहासकारों के अनुसार अगोरी के राजा मोलागत के अधीन ही महरा (मेहर) नाम का अहीर रहता था | महरा की ही आख़िरी सातवीं संतान थी मंजरी | जो अत्यंत ही सुन्दर थी | जिस पर मोलागत की बुरी नजर पडी थी और वह उसे महल में ले जाने का दबाव डाल रहा था। इसी दौरान मंजरी के पिता महरा को लोरिक के बारे में जानकारी हुई और मंजरी की शादी लोरिक से तय कर दी गयी । वीर अहीर लोरिक बलिया जनपद के गौरा गाँव के निवासी थे, जो बहुत ही बहादुर और बलशाली थे | युद्ध में वे अकेले हज़ारो के बराबर थे। मंजरी की विदाई के बाद डोली मारकुंडी पहाडी पर पहुँचने पर नवविवाहिता मंजरी लोरिक के अपार बल को एक बार और देखने के लिए चुनौती देती है और कहती है कि कि कुछ ऐसा करो जिससे यहां के लोग याद रखें कि लोरिक और मंजरी कभी किस हद तक प्यार करते थे। लोरिक कहता है कि बताओ ऐसा क्या करूं जो हमारे प्यार की अमर निशानी बने ही, प्यार करने वाला कोई भी जोड़ा यहां से मायूस भी न लौटे। मंजरी लोरिक को एक पत्थर दिखाते हुए कहती है कि वे अपने प्रिय हथियार से एक विशाल शिलाखंड को एक ही वार में दो भागो में विभक्त कर दें – लोरिक ने ऐसा ही किया और अपनी प्रेम -परीक्षा में पास हो गए |
यह खंडित शिला आज उसी अखंड प्रेम की जीवंत कथा कहती प्रतीत होती है | मंजरी ने खंडित शिला को अपने मांग का सिन्दूर भी लगाया। यहाँ हर साल गोवर्द्धन पूजा और अन्य अवसरों पर मेला लगता है -लोग कहते हैं कि कुछ अवसरों पर शिला का सिन्दूर चमकता है ।

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रहस्य और तिलिस्म का  आदिवासी किला

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सोनभद्र- अगोरी किला सोनभद्र ब्‍लाक के चोपन में  स्थित है। यह किला, इस क्षेत्र के मुख्‍य ऐतिहासिक स्‍मारकों और पर्यटन आकर्षणों में से एक है। इतिहासकारों के अनुसार अगोरी किले पर वास्‍तविक अधिकार खारवार शासकों का था, बाद में किले पर चंदेल वंश के शासकों ने आधिपत्‍य जमा लिया। इस किले को आदिवासी किला भी कहा जाता है क्‍योंकि इसके अन्तिम शासक एक आदिवासी राजा ही थे। किले में आज भी वो रहस्य और तिलिस्म दफ़न हैं जिसको न कोई इतिहासकार समझ पाया है और ना ही कोई आम इंसान। जानकार बताते हैं कि इस किले में आज भी अदृश्य शक्तियों का राज हैं, जो किले में मौजूद बेशकीमती खजाने की रक्षा करते हैं। इस किले पास युद्ध में सैकड़ों लोगों की जाने गईं थीं। कहा जाता हैं मरे हुए लोगों की आत्मा आज भी शाम होते मुक्ति के लिए चीखती हैं।

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पंचमुखी मंदिर मार्कण्डेय ऋषि की तपोस्थली 

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सोनभद्र-  चुर्क के समीप सहजन कला गांव की पहाड़ी पर स्थित पंचमुखी मंदिर मार्कण्डेय ऋषि की तपोस्थली रही है। यह स्थल दक्षिण मध्य काशी के मध्य श्मशान तंत्रपीठ भी है मंदिर के पुजारी लक्ष्मण द्विवेदी बताते है कि पांच मुख के भगवान भोलेनाथ स्वयंभू है।और उनकी माने तो मूर्ति की स्थापना नहीं की गई थी। द्वापर युग में पांडवों को वनवास होने पर अर्जुन द्वारा यहीं पर भगवान शिव की तपस्या की गयी थी। यहीं पर भगवान भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर अर्जुन को पशुपत अस्त्र प्रदान किया था। पंचमुखी भगवान शिव मंदिर में मूर्ति की स्थापना नहीं की गई थी। यहां पर भगवान का शिवलिंग स्वयं जमीन से निकला है। इसलिए इसे स्वयंभू कहते है। जमीन के अंदर से शिवलिंग के प्रकट होने के कारण लोग इसे चमत्कार मानते है।

चंद्रकांता के अमर प्रेम  का प्रतीक विजयगढ़ दुर्ग 

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सोनभद्र-जिला मुख्यालय रावर्टसगंज से करीब 25 किमी दूर स्थित विजयगढ़ दुर्ग चंद्रकांता की अमर प्रेम कहानी का प्रतीक है। नौगढ़ के युवराज संग उसकी प्रेम कहानी को लेकर बना टीवी सीरियल चंद्रकांता प्रसारित हुआ था, जो काफी सराहा गया। लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के कारण यह स्थल अवशेष मात्र रह गया है। सरकारों ने इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले दिनों में यह तिलिस्मी किला महज इतिहास बनकर रह जाएगा। इसकी पहचान सिर्फ मीरान शाह बाबा की मजार और राम-सीता सरोवर के नाते बची है। करीब 1040वीं सदी में राजा चेत सिंह का बनवाया गया विजयगढ़ दुर्ग तिलिस्मी है। चंद्रकांता धारावाहिक से ख्याति प्राप्त कर चुके इस तिलिस्मी दुर्ग की खासियत है कि किले के अंदर से गुफा के जरिए नौगढ़ और चुनार गढ़ किले के लिए रास्ता है। यह रास्ता तिलस्म से ही खुलता है। किले का खजाना भी इन्हीं गुफाओं में छिपे होने की संभावना अक्सर लोगों द्वारा जताई जाती है। दुर्ग के ऊपर बने छोटे-बड़े सात तालाब हैं। इनमें रामसरोवर तालाब और सीता तालाब में कभी पानी सूखता। यहां कांवरिये जल भरकर जलाभिषेक करने जाते हैं।  किले के पश्चिम दिशा में मुख्य द्वार है, जो धराशायी हो रहा है।इसकी दीवारें गिर रही हैं। लोगों का कहना है कि जिस तरह से दीवारों का ढहना जारी है उससे कुछ दिनों में इनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। किले के दक्षिण और पूर्व के कोने पर खिड़की का रास्ता है। ज्यादातर लोग इसी रास्ते से किले पर जाते हैं, क्योंकि यह कम ऊंचा है। यहां कुछ सीढ़ियां भी बनी हैैैं लेकिन अधूरी हैं।  जमीन से करीब पांच सौ मीटर ऊंचाई पर बने इस किले के अंदर जो कमरे बने थे वो खंडहर हो गए हैं।

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सृजन मुद्रा में शिव पार्वती

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सोनभद्र-शिव द्वार मंदिर, उत्‍तर प्रदेश के रॉबर्ट्सगंज के पश्चिम में 40 किमी. दूर, शिवद्वार रोड़ पर घोरवाल से 10 किमी. की दूरी पर स्थित है।  यह  मंदिर, भगवान शिव और  पार्वती को समर्पित है। इस मंदिर के गर्भगृह में शिव पार्वती की 11 वीं सदी की काले पत्‍थर की मूर्ति रखी हुई है। यह तीन फुट ऊंची मूर्ति सृजन मुद्रा में रखी हुई है जो एक रचनात्‍मक मुद्रा है। यह मंदिर उस काल के शिल्‍प कौशल के बेहतरीन नमूने और शानदार कला का प्रदर्शन करता है। यह मंदिर, क्षेत्र के सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक है।

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सलखन जीवाश्‍म पार्क

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सोनभद्र का सलखन जीवाश्‍म पार्क, सोनभद्र  जिले के कैमुर वन्‍यजीव अभयारण्‍य के अंदर स्थित है।  यह पार्क, सोनभद्र जिले की भू- वैज्ञानिक विरासत का प्रतिनिधित्‍व करता है। पेड़ जीवाश्‍म, वास्‍तव में, पेड़ स्‍टंप में कार्बनिक पदार्थ, पेट्रीफाइड या कॉन्‍क्रिटाइज्‍ड रूप में पाएं जाते है। इस क्षेत्र में सर्कुलर स्‍टोनी फॉरमेशन ( परिपत्र पथरीले संरचनाओं ) पर शैवाल या स्‍ट्रॉमोटोलाइट्स प्रकार के जीवाश्‍म पाएं जाते है।  भूवैज्ञानिकों के अनुसार, यह पेड़ के जीवाश्‍म लगभग 1400 मिलियन साल पुराने है और प्रोटेरोज़ोइक काल के हैं। यह पार्क 25 हेक्‍टेयर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है।

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सोनभद्र- चोपन स्थित ओम पहाड का अदभु दृश्‍य 

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