मानसून में क्लाउड कम्प्यूटिंग?

sandeep (1)किसी मित्र ने एक पुराना यूट्यूब वीडियो शेयर किया है. इसमें एक पूर्व आला आयकर अधिकारी और समाजसेवी सज्जन ( नाम जानबूझकर नहीं दिया जा रहा है) क्लाउड कम्प्यूटिंग और मोबाइल की बैटरी के जरिए डाटा की चोरी के खतरे के बारे में अपने विलक्षण विचार पेश करते नजर आ रहे हैं.
उनका कहना है कि क्लाउड कम्प्यूटिंग एक बहुत अच्छी चीज है, लेकिन अभी तक इसकी इस नजर से प्रॉपर टेस्टिंग नहीं हो पाई है कि अगर बारिश आई या अंधड़ आया तो क्लाउड में स्टोर किए गए डाटा का क्या होगा. जिस आदमी का डाटा बह जाएगा, उसे तो आप गलत साबित करके जालसाजी में पकड़ लेंगे. ऐसे में अगर सही आदमी गलत साबित हो सकता है तो गलत आदमी सही भी साबित हो सकता है.  उनकी दूसरी चिंता इस बात को लेकर है कि हम अपने पुराने फोन से सिम निकालकर उसे कबाड़ में बेच देते हैं. जबकि हमारे सिम में दर्ज हमारे सारे नंबर और मैसेज तो पहले ही मोबाइल की बैटरी में जा चुके हैं. उनका कहना है कि इसी लिए सभी बड़ी मोबाइल बनाने वाली कंपनियां हमसे पुराने मोबाइल को फेंकने की बजाए उसे हथौड़े से तोड़ने का इसरार करती हैं ताकि उसकी बैटरी के जरिए हमारा डाटा गलत हाथों में न जा पाए.
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ये महाशय जो कह रहे हैं, उसकी सोशल मीडिया में जबर्दस्त खिल्ली उड़ाई जाती रही है. जिस वीडियो का यहां जिक्र किया गया है, उसे अब तक चार लाख चौरासी हजार दो सौ से ज्यादा  लोग देख चुके हैं. यह कोई आइटम नंबर नहीं है और न ही किसी आतंकवादी सरगना द्वारा बंधक का गला रेतने का वीडियो है, इसे देखने-दिखाने का मकसद सिर्फ एक ऐसे ज्ञानी की खिल्ली उड़ाना है जो एक ऐसे विषय पर अपनी राय जाहिर कर रहा है, जो कि उसका नहीं है. लेकिन, यदि आप ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब, व्हाटएप्स जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया मंचों को खंगाले तो हर दसवां आदमी आपको इससे भी ज्यादा ज्ञान बधारता दिख जाएगा. ऐसे महाज्ञानियों की तादाद बहुत बड़ी है, जो हर विषय पर राय देना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं. भले ही उस विषय का ककहरा भी उन्हें न आता हो.
दिलचस्प बात यह है कि एक ओर तो ऐसे महाज्ञानी है, जो मौन के आभूषण को पहनने में अपनी तौहीन महसूस करते हैं तो दूसरी ओर ऐसे लोगों की तादाद भी बहुत बड़ी है, जो हर समय लतीफे गढ़ने के लिए कोई न कोई बकरा खोजते रहते है और घात में रहते हैं कि कब आप कोई चूक करें और कब वे लपक कर आपको अपने पंजों में दबोच लें. हर किसी का मजाक उड़ाना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है. आलिया भट्ट, राहुल गांधी, सौरव गांगुली, महेंद्र सिंह धोनी, शाहरुख खान, नील नितिन मुकेश, आलोकनाथ, राजदीप सरदेसाई और हाल ही में इस श्रेणी में शामिल हुए माननीय एचआरडी मिनिस्टर प्रकाश जावड़ेकर  तक, इनकी चपेट में आ चुके हैं.
शायद इसे भी सोशल मीडिया का एक योगदान ही कहा जाना चाहिए कि इसने दुनिया भर में फैली इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है कि भारतीयों में ‘सेंस आॅफ ह्यूमर’ की भारी कमी होती है…भले ही अक्सर वह ‘नाॅनसेंस आॅफ ह्यूमर’ हो जाता हो.
 
संदीप अग्रवाल
एडिटर-इन-चीफ

 

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