नदियां आभारी हैं

sandeep-bपिछले सप्ताह जब न्यूजीलैंड की सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए वांगनुई नदी को एक जीवित इंसान का दर्जा देते हुए, उसे प्रदूषित करने को मानव हत्या सरीखा माने जाने की व्यवस्था कर दुनिया के सामने एक नजीर पेश की थी, उस समय हजारों पर्यावरणप्रेमियों के मन में एक टीस सी उभरी होगी कि काश अपने यहाँ भी ऐसा हो पाता और नदियों को नालियों में बदलने वाले व्यक्तियों और संस्थानों को संगीन जुर्म का अपराधी मानते हुए सख्त से सख्त सजा सुनाई जा सकती.

खुशी और खुशकिस्मती की बात है कि एक ही सप्ताह के भीतर अपने यहाँ उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है और देश की सबसे अधिक पावन-पूजनीय नदियों में गिनी जाने वाली गंगा-यमुना को इंसान का दर्जा दिया है और इन्हें प्रदूषित करना अपराध घोषित कर, ऐसा करने वालों के खिलाफ मुकदमा दायर करने के लिए एक समिति बनाई है.

मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद नदियों को बचाने के लिए एक पृथक मंत्रालय गठित किया था, जिसका जिम्मा साध्वी सरीखी मानी जाने वाली नेता उमा भारती को सौंपा था. लेकिन, ढाई साल बीत जाने के बाद भी ढाक के पात ढाई ही रहे, तीन नहीं हुए. सरकार, सुप्रीम कोर्ट की फअकार झेलती रही, बचाव के रास्ते तलाशती रही, बहाने बनाती रही…

इन बहानों में एक यह भी था कि उ.प्र. और उत्तराखंड की राज्य सरकारें इस काम में अडंगा डाल रही हैं. यह भी एक सुखद संयोग है कि इस हफ्ते में दोनो ही राज्यों में केंद्र में सत्तासीन भाजपा की ही सरकारें सत्ता में आ गई हैं और अगर केंद्र की मंशा ईमानदार और नीयत साफ है तो राज्यों का अडंगा डाले जाने जैसी स्थिति शायद ही पैदा हो…और अगर होती भी है तो कोर्ट ने केंद्र को धारा-365 के तहत प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए राज्य सरकारों को बर्खास्त करने की सलाह दी है.

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यह शर्मनाक है कि हमारे देश की सबसे पूज्य और पवित्र माने जानी वाली नदी गंगा की गणना दुनिया की दस सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियों में होती है और इसे देश में फेली 19 प्रतिशत बीमारियों के लिए जिम्मेदार माना गया है. तीस साल में 22 हजार करोड़ खर्च करने के बावजूद जब इसके तीन हजार गुना ज्यादा प्रदूषित होने की बात सामने आती है तो पता चलता है कि एक नागरिक के तौर पर हम अपनी प्राकृतिक संपदाओं के प्रति कितना लगाव रखते हैं.

दंड की व्यवस्था ही नहीं, इसका समय पर और सख्ती से पालन शायद कोई फर्क पैदा कर सकता है, लेकिन इसके अलावा एक जनचेतना का प्रसार भी बहुत जरूरी है और लोगों को इस बात का बोध कराना भी कि देश का 25 फीसदी पीने योग्य पानी गंगा में है, इसे प्रदूषित कर हम कहीं के नहीं रहेंगे.

सिर्फ गंगा और यमुना ही नहीं, देश की सभी नदियों को इंसान का दर्जा दिया जाना चाहिए और नदी ही क्यों, पेड़ों को भी इंसान क्यों न माना जाए, जो विकास की अंधी दौड़ में बडी बेरहमी से लगातार कत्ल किए जा रहे हैं.

और ऐसा कर हम प्रकृति पर कोई अहसान नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें इंसान मानना इंसानों के लिए भी कम जरूरी नहीं है. क्योंकि जब नदियां बचेंगी, पेड़ बचेंगे; तभी हम भी बचेंगे.

संदीप अग्रवाल
एडिटर-इन-चीफ

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