लौटेगा चीता!

चीता, जिसे अधिकांश भारतीय टाइगर का हिंदी अनुवाद समझते हैं, दरअसल एक ऐसा प्राणी है, जो अंधाधुंध शिकार के चलते 73 साल पहले भारत से लगभग विलुप्त हो चुका है.अच्छी खबर यह है कि अब इसके देश में फिर से नजर आने के आसार बन रहे हैं.
माना जाता है कि चीता आधुनिक भारत का इकलौता स्तनधारी प्राणी है, जो शिकार की वजह से विलुप्त हुआ है. इसके लिए सबसे बड़ा दोषी माना जाता है कोरिया, छत्तीसगढ़ के देवघर के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह को, जिन्होंने देश के आखिरी एशियाई चीते के शिकार के लिए जाना गया. हालांकि इसके बाद अगले चार—पाँच सालों में देश के विभिन्न इलाकों में इन्हें देखे जाने की इक्का—दुक्का मामले सामने आए, फिर 1952 में इन्हें आधिकारिक रूप से विलुप्त प्रजाति घोषित कर दिया गया.

नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी इस बारे में पिछले करीब एक दशक से इस संबंध में एक प्रोजेक्ट स्टार्ट करने की कोशिश कर रही थी जिसके तहत देश में अफ्रीकी चीतों को रिइंट्रोड्यूस किया जाना है. अच्छी खबर यह है कि पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने पायलट प्रोजेक्ट को अपनी मंजूरी देकर नामीबिया से चीतों को भारत में रिइंट्रोड्यूस करने का रास्ता साफ कर दिया है. उन्हेें रखने के लिए की उपयुक्त जगह का फैसला एक सर्वेक्षण के जरिए किया जाएगा, जहाँ वे सरवाइव कर सकें.
फिल्हाल उन्हें प्रयोग के आधार पर रिइंट्रोड्यूस किया जाएगा, ताकि यह जाना जा सके कि क्या वे भारतीय परिस्थितियों को अपनाकर यहाँ जीवित रह पाते हैं.
इस बारे में एक कमेटी गठित की गई है, जिसमें वन एंव पर्यावरण विभागों के कई पूर्व व वर्तमान आला अफसर शामिल हैं, जो एनटीसीए के साथ मिलकर प्रोजेक्ट को अंजाम देने का काम करेगी. कमेटी को प्रोजेक्ट की मॉनिटरिंग करते हुए हर चार महीने में अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सबमिट करने के लिए कहा गया है, ताकि एक जगह चीतों के अनुकूल न पाए जाने की स्थिति में उन्हें दूसरी जगह बसाया जा सके.
उल्लेखनीय है कि 2013 में भी सरकार ने चीतों को म.प्र. के कुनो नेशनल पार्क में रिइंट्रोड्यूस करने के लिए अपील दायर की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रिजेक्ट कर दिया था. ये अपील ​एशियाई चीतों को भारत लाने के लिए थी, जिन्हें एक विलुप्तप्राय: प्रजाति माना जाता है और समझा जाता है कि ये केवल ईरान में सरवाइव कर सकते हैं.

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