बेनिफिट्स आॅफ नथिंग

‘हे,क्या कर रहे हो?’
‘नथिंग…’
‘वेल, समटाइम्स नथिंग इज बेटर दैन एनिथिंग…’

चौंक गए ना… जब आप हमेशा यही जुमला सुनते आए हों कि समथिंग इज बेटर दैन नथिंग तो आपका चौंकना स्वाभाविक है. लेकिन, एक रीसेंट रिसर्च में खुलासा हुआ है कि कई बार ‘नथिंग’ करना सबसे बेहतर होता है.
एक ऐसी दुनिया में जहाँ कुछ न करना सबसे बुरी बात माना जाता है, आप हर समय कुछ न कुछ करने के दबाव में रहते हैं. भले ही जो आप कर रहे हों या करने वाले हों, उसका कोई मतलब हो या न हो, लेकिन समथिंग इज बेटर दैन नथिंग में विश्वास रखने वाले समाज में अगर आप इस आदर्श वाक्य का अनुसरण नहीं करते तो आपके हिस्से में परिवार की, पड़ोसियों की, समाज की आलोचना और नाराजगी का आना तय है. आप कितने भी ढीठ बनने की कोशिश करें, लेकिन आप पर व्यंग्यवाण छोड़ने वाले तरकश कभी खाली नहीं होते.

इसी डर का नतीजा है कि आप हर सुबह दिन भर के ‘आज करना है’ की लिस्ट के साथ जागते हैं, और एक ‘आज भी नहीं कर पाया’ के अपराधबोध के साथ बिस्तर में जाते हैं और घंटों तक करवटें बदलते रहते हैं.
द गार्डियन की एक रिपोर्ट में मर्लिन मन नाम के एक शख्स की कहानी बताई गई है, जिसे अपने ई-मेल सिस्टम पर इनबाॅक्स जीरो नाम की एक किताब लिखने का जिम्मा सौंपा गया. दो साल तक उसने अपना प्रोजेक्ट रोक दिया और इसकी बजाए एक ब्लाॅग लिखा कि उसने समय का सद्उपयोग कैसे करें पर फोकस करने में इतना लंबा समय बिताया और अंत में पाया कि वह दो साल तक अपनी बेटी के साथ बिताए जा सकने वाले खूबसूरत पलों को गंवा दिया.
यह मर्लिन की ही नहीं, उस जैसे हम सबकी कहानी है जो अपने वक्त को ज्यादा से ज्यादा कीमती बनाने की जद्दोजहद में जिंदगी के उन बेशकीमती पलों को गंवा देते हैं, जब हम जिंदगी का असली मजा ले सकते थे.
वरिष्ठ कवि नरेश मेहता ने अपनी अमर काव्य रचना प्रवाद पर्व में लिखा है, ‘‘क्या यही है मनुष्य का प्रारब्ध? क्या यही है मनुष्य का प्रारब्ध ? कि कर्म, निर्मम कर्म, केवल असंग कर्म करता ही चला जाए ? भले ही वह कर्म धारदार अस्त्र की भांति न केवल देह बल्कि उसके व्यकित्व को रागात्मिकताओं को भी काट कर रख दे…’ इन पंक्तियों को दो बार पढ़िए और ईमानदारी से खुद को जवाब दीजिए कि क्या आप इसी स्थिति में नहीं जी रहे?
जीवन को बेहतर बनाने के लिए आप पूरा दिन, बल्कि ताउम्र दौड़ते रहते हैं और जब थककर रुकते हैं तो पाते हैं कि जिस जीवन को बेहतर बनाने के लिए आप दौड़ रहे थे, वह तो कहीं है ही नहीं? कर्म जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन जीवन कर्म के लिए अनिवार्य है. जब जीवन ही नहीं रहेगा तो कर्म कैसा और कर्म क्यों? सिर्फ साँस लेना ही जीवन नहीं है, बल्कि जीने का आनंद लेना भी जीवन है. जितना वक्त हम काम पर देते हैं, उसका एक चौथाई हिस्सा अगर खुद पर ध्यान देने में लगाएं तो यकीन मानिए, इससे आपकी उत्पादकता कम नहीं होगी, बल्कि बढ़ेगी.
‘नथिंग’ एक ऐसा ब्रेक है, जो आपको एनर्जाइज करता है कि जीवन का आनंद लेते हुए आप कम वक्त में भी उतना ही काम कर सकें, जितना कि नीरस सी जिंदगी जीते हुए ज्यादा वक्त में करते हैं. आखिर यह बेवजह नहीं है कि बहुत से देशों में काम के घंटे और काम के दिन घटाने की दिशा में गंभीरतापूर्वक विचार किया जा रहा है और कुछ में इसे अमल में भी लाया गया है.
प्रोडक्टिव टाइम और क्वालिटी टाइम में बहुत फर्क होता है, लेकिन जीवन के लिए दोनों ही जरूरी हैं. जिस दिन आप यह बात अपने दिमाग में बिठला लेंगे, उसी दिन से आप अपने काम और उसके प्रतिफल का सही मायने में आनंद ले पाएंगे.

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