जब तक दवाई नहीं…

‘जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं’ जब भी आप किसी को फोन लगाते हैं तो महानायक की धीर—गंभीर आवाज में यह मैसेज सुनने को मिलता है. लेकिन, स्कूलों को फिर से शुरू करने के लिए प्रदेश सरकार की ओर से जो जल्दबाजी की जा रही है, उसे देखते हुए यह माँग करना अनुचित नहीं होगा कि जब तक दवाई नहीं, तब तक पढ़ाई नहीं.

कई स्कूलों ने पालकों के नाम एकतरफा संदेश भेजा है, जिसमें उन्हें सिर्फ बच्चों को स्कूल भेजने पर अपनी सहमति देनी है… असहमति देने का विकल्प ही नहीं था. तो कुछ स्कूलों ने फॉर्म में साफ-साफ लिख दिया है कि अगर किसी बच्चे को कोविड—19 होता है तो इसमें स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी. फिर यह किसकी जिम्मेदारी है? इस बात का उत्तर किसी के पास नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट कहती है कि जीवित रहोगे तभी तो त्यौहार मना पाओगे. यह बात पढ़ाई के संबंध में क्यों नहीं सोची जा रही. एक साल बच्चे अगर स्कूल नहीं जाएंगे तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा. जब जीवित रहेंगे तभी तो आगे पढ़ेंगे. एक तरह सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियां कोरोना की दूसरी—तीसरी लहर की चेतावनी दे रही हैं, दूसरी ओर पढ़ाई के नाम पर बच्चों को खतरे में डाला जा रहा है.

बच्चे कोरोना संक्रमण के सबसे आसान शिकार होते हैं. कई देशों में स्कूल शुरू करने के नकारात्मक परिणाम सामने आए हैं. जैसे फ्रांस में सितंबर में स्कूल खोले गए तो 70 हजार बच्चे इससे संक्रमित हो गए. ब्रिटेन में स्कूल खोलने के फैसले के खिलाफ अभिभावक बड़ी तादाद में सड़कों पर उतर आए.

विदर्भ पैरेंट्स एसोसिएशन कोरोना वैक्सीन आने से पहले स्कूल खोलने के फैसले का निषेध करती है और सभी पालकों—अभिभावकों का आह्वान करती है कि वे अपने बच्चों की सेहत और जान को जोखिम में न डालें और उन्हें स्कूल न भेजें.

एसोसिएशन की सरकार से अपील है कि वह इस शै​क्षणिक सत्र को शून्य सत्र घोषित करे. 1969 में ऐसे ही एक संकट के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री दिवंगत इंदिरा गाँधी ने शून्य शै​क्षणिक सत्र घोषित किया था. एसोसिएशन इस बारे में अपने लीगल एक्सपर्ट्स से भी विमर्श कर रही है.

( ये लेखक के निजी विचार हैं. संदीप अग्रवाल विदर्भ पैरेंट्स एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष हैं)

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