नहीं चलेगी झांसेबाजी

Copy of IMG_20150228_161333विज्ञापनों में अपने प्रोडक्ट या सर्विसेज के बारे में बढ़चढ़ कर दावे करना, कारपोरेट सेक्टर का एक फेवरेट स्टाइल रहा है. कई बार तो ये सारी सीमाएं लांघ जाते हैं. कभी हाईट बढ़ाने के, कभी गोरा करने के, कभी बुढ़ापे से बचाने के, कभी सारी रात एक्टिव रहने में सक्षम बनाने के या ऐसे तमाम किस्म के दावे करते हुए यह साइंस और नेचर के सारे इस्टेब्लिश्ड रूल्स को ठेंगा दिखा देते हैं.

और इन दावों पर लोगों को यकीन दिलाने के लिए ये सेलिब्रिटीज का सहारा लेते हैं, जिनके कद्रदान उनकी बातों पर यकीन करते हुए इन प्रोडक्ट्स को खरीदने के लिए प्रेरित होते हैं. एक लंबे समय से जाने-अनजाने, पैसे के लालच में ऐसे झूठे दावों के साथ की जा रही ठगी में हिस्सेदार बनने वाले सेलिब्रिटीज पर लगाम लगाने की कवायद की जा रही थी, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से मामला आगे नहीं बढ़ पाता था.

इसी हफ्ते केेद्र सरकार ने एक बिल पास कर  मिसलीडिंग एडवर्टाइजमेंट्स के लिए न सिर्फ उन्हें एन्डोर्समेंट करने वाले सेलिब्रिटीज, बल्कि ऐसे एड को पब्लिश करने वाले न्यूजपेपर्स पब्लिशरों और ब्राॅडकास्ट करने वाले टीवी चैनलों को भी जिम्मेदार माना है और इसके लिए उनके खिलाफ  जुर्माना और  बैन की व्यवस्था की है.

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उपभोक्ता संरक्षण के पक्ष में यह एक अच्छी शुरुआत हो सकती है, लेकिन इसके अमल में दिक्कत भी बहुत आएंगी, क्योंकि किसी भी चीज से फायदा या नुकसान उठाने की हर व्यक्ति की प्रवृत्ति अलग-अलग हो सकती है. अगर कोई कन्ज्यूमर कम्प्लेंट करे कि एक तेल से उसके बाल काले या घने नहीं हुए तो कंपनी ऐसे बहुत सारे कन्ज्यूमर्स के सेटिस्फेक्शन सर्टिफिकेट पेश कर सकती है, जिनका एक्सपीरिएंस पाॅजिटिव रहा हो. हो सकता है कि एक वेट लाॅस दवा खाने से कुछ लोगों को कोई फर्क न पड़े, लेकिन कुछ लोगों को वाकई उससे वेट घटाने में मदद मिली हो. देखते हैं, आगे ऊंट किस करवट बैठता है.

संदीप अग्रवाल
एडिटर-इन-चीफ

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