मनुष्य और महात्मा

आज राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की शतकोत्तर स्वर्ण जयंती वर्ष में पड़ रही 72वीं पुण्यतिथि है. पूरे देश में उन्हें अपने-अपने तरीके से याद किया जा रहा है, हम भी करेंगे. इस मौके पर एक रस्म अदायगी के साथ-साथ, अगर इस लार्जर दैन लाइफ हस्ती को कुछ अलग तरीके से समझने की कोशिश की जाए तो बेमानी न होगा.

बैरिस्टर मोहनदास से महात्मा और फिर राष्ट्रपिता बनने तक की गाँधी जी की यात्रा के बारे में बहुत कुछ लिखा-पढ़ा, सुना-कहा, विचारा-बिसराया जा चुका है, हम और नया क्या कह सकते हैं. गाँधी जी ने इतनी पदयात्रा की थी कि धरती की सात परिक्रमा पूरी हो जाएं, हमने उन पर इतनी शब्द यात्रा की है कि अगर सारे शब्दों को एक कतार में रखा जाए तो धरती की असंख्य परिक्रमाएं की जा सकती हैं.
गाँधी जी की मृत्यु के करीब दो दशकों तक, जब तक एक और गाँधी का राष्ट्रीय परिदृश्य नहीं हुआ था, उन्हें जहाँ बापू के रूप में देश में बहुत सम्मान और प्यार हासिल था, वहीं उनके दर्शन को भी समाज ने एक आदर्श आचरण के तौर पर स्वीकार किया था. लेकिन, 1971 में भारत की पाकिस्तान पर ऐतिहासिक विजय के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी इतनी कद्दावर हो गईं थीं कि लोगों की आस्था विभाजित हो गई और राजनीति को समझ में आने लगा कि अतीत के गाँधी जी का अनुसरण करने से भविष्य के गाँधियों का अनुसरण करना ज्यादा लाभदायक है और तब से पीढ़ी दर पीढ़ी गाँधी वंदना का जो कार्यक्रम आरंभ हुआ, वह आज तक जारी है. जबकि असली गाँधी जी सिर्फ करेंसी, सरकारी कार्यालयों में लगी तस्वीरों, चौराहों पर लगी मूर्तियों और दो अक्टूबर-तीस जनवरी जैसी तारीखों में सिमट कर रह गये.बाकी उन्हें याद किया भी जाता तो राजनीति फायदों के लिए उल्टी-सीधी बयानबाजी के लिए. कभी कोई उन्हें शैतान की औलाद कहता तो कभी कोई उन्हें राष्ट्रपिता मानने से इंकार कर देता. उनके अपनों ने ही उन्हें एक ब्रांड बना दिया.
लेकिन, कहते हैं न कि ‘सब दिन होऊ न एक समाना…’ गाँधी जी को उनकी मृत्यु के सत्तर साल बाद कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम उन्हें याद करते हैं या नहीं करते. लेकिन हमें पड़ता है, और अच्छी बात यह है कि हमने इस बात को अनुभव करना शुरू कर दिया है कि अभी भी गाँधी के सारे विचार और सिद्धांत पूर्णतः अप्रासंगिक नहीं हुए हैं. बहुत कुछ ऐसा बाकी है, जिसका अनुसरण हमें समृद्धि और खुशहाली के पथ पर ले जाने में सक्षम है. नीतियों में गाँधी जी वापस आ चुके हैं. कभी वे सड़कों पर दिख रहे स्वच्छता आंदोलन में नजर आते हैं तो कभी गरीब-वंचितों और गाँवों के विकास के लिए चलाए जा रहे विकास कार्यक्रमों में.
गाँधी जी के खिलाफ लंबे समय तक चले घृणित प्रचार की धार भी धीरे-धीरे कुंद होती जा रही है और नए दौर का भारत उनके दिखाए रास्ते पर चलकर गर्व का अनुभव कर रहा है. यह रोशनी निरंतर और फैलेगी, इसी आशा के साथ राष्ट्रपिता गाँधी जी को हार्दिक श्रद्धांजलि. ….
संदीप अग्रवाल
एडिटर-इन-चीफ

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