मत छीनो अंधेरा

sandeep (1)दुनिया भर में अलग-अलग स्तरों पर ज्यादा से ज्यादा रोशनी का इंतजाम करने की कवायदें जारी हैं. कहीं नकली सूरज बनाने की तैयारी चल रही है, कहीं आईने लगाकर उसकी रोशनी की अवधि को लंबा किया जा रहा है. ज्यादा से ज्यादा शहर खुद को ‘सिटी, दैट नेवर स्लीप’ बनाने की तैयारी में लगे हैं. हाल ही में सरकार ने माॅल, होटलों आदि को कुछ मामूली शर्तों के साथ चौबीसो घंटे खुला रखने की इजाजत दे दी है.

इस सबका हमारी ज़िंदगी पर क्या असर पड़ने वाला है, इसके बारे में कहीं कोई चर्चा नहीं है. लोग ज्यादा से ज्यादा जागना चाहते हैं, क्योंकि सोना उनकी नजरों में समय की बर्बादी है. इसलिए वे अंधेरे के खिलाफ रोशनियों की मात्रा लगातार बढ़ाते जा रहे हैं. ज्यादा से ज्यादा रोशनी देने वाले उपकरण बनाए जा रहे हैं.

वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण की तरह, यह भी एक ऐसा पाॅल्यूशन है, जिसके बारे में गंभीरता से सोचने का वक्त आ गया है. रोशनी जरूरी है, क्योंकि यह सकारात्मकता की प्रतीक है और उस अंधेरे को दूर करती है, जिसे हमेशा से भय और पाप को जन्म देने वाला माना गया है. लेकिन, कभी आपने कल्पना की है कि अंधेरा न हो तो क्या होगा?

dark

अंधेरा हमारी ज़िंदगी से किस तरह कम हो रहा है, इसका अंदाजा बरसात के मौसम में किसी भी रात को अपने घर की छत पर जाकर देख लीजिए. धरती पर फैली रोशनी की वजह से अब आप बादलों को नंगी आंखों से भी देख लेते हैं, जो कुछ साल पहले बहुत मुश्किल हुआ करता था, वहीं इसी आसमान में जगमगाने वाले तारों को देखने के लिए, खोजने के लिए आपको बहुत जोर डालना पड़ता है, क्योंकि आसमान बेइंतहा रोशनी की वजह से धुंधलाता जा रहा है.

अंधेरा हमारे लिए रोशनी जितना तो नहीं, फिर भी बहुत ज्यादा जरूरी है. सारी रोशनियां बंद कर आप अंधेरे से मिलने वाली राहत को महसूस कर सकते हैं. अगर अंधेरा नहीं रहा तो आप सो भी न पाएंगे. जरूरत से ज्यादा रोशनी सिर्फ हमारी आंखों को हो नहीं, त्वचा पर भी बुरा असर डालेगी. प्रकृति और जैवविविधता पर इसका जो असर पड़ेगा, वह अलग.

रात को रात ही रहने दीजिए. उसे दिन में बदलने की कोशिश मत कीजिए. वर्ना हर दम की रोशनी हमें कहीं का न छोड़ेगी.

संदीप अग्रवाल
एडिटर-इन-चीफ

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