ग्लोबल कूलिंग की चुनौती

ऐसे वक्त में जब दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चिंता और चिंतन का जोर है, ग्लोबल कूलिंग की बात अजीब सी लग सकती है, मगर यह एक ऐसी सच्चाई है जिसके संभाविद नतीजों पर यदि समय रहते विचार न किया गया तो जीवो और वनस्पतियों की शक्ल पें पृथ्वी पर मौजूद जीवन को काफी उथलपुथल का सामना करना पड सकता है.

Image courtesy : Wildone(Pixabay)

अगस्त 2012 में रूस की विज्ञान अकादमी के अंतरिक्ष विभाग के प्रमुख डाॅ. हबीबुल्लो बल्दुसाम्तोव ने ग्लोबल कूलिंग की भयावहता की और विश्व समुदाय का ध्यान दिलाने की कोशिश की थी. हालांकि उन्होंने इशारा किया थ कि ग्लोबल वार्मिंग मे लगभग दो सदियों का वक्त बाकी है, जबकि ग्लोबल कूलिंग यानि धरती के ठंडे होते जाने का सिलसिला अगले पाॅंच-सात वर्षो के भीतर ही शुरू होने जा रहा है और अगले पचास-साठ सालों मे अपने चरम पर पहुॅंच जाएगा. इसके बावजूद वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, संबंध्ाित संस्थानों का जो रवैया है, वह ऐसा लगता है मानों सब के सब दूरदृष्टि दोष से ग्रस्त हों. जिन्हे दूर के खतरे तो नजर आते हैं, लेकिन एक दम सामने के नहीं.
ग्लोबल कूलिंग की समस्या को लेकर चिंता एकदम नई हो, ऐसा नही है. सत्तर के दशक तक ग्लोबल कूलिंग भी इसी तरह विश्व चिंता का विषय बनी हुई थी, जैसे कि आज ग्लोबल वार्मिंग है. 1940 से 1970 तक कहीं तापमान गिरने की खबरों को काफी संजीदगी से लिया जाता था और हर सर्दी के मौसम को संभवित हिमयुग के प्रमाण के रूप में देखा जाता था. वही पिछले साल जब दिल्ली में शिमला से ज्यादा ठंड होने, कश्मीर में पिछले तीस सालों में सबसे ज्यादा हिमपात और इसमें डेढ सौ लोंगों के मारे जाने या मंुबई में पिछले चालीस सालों का न्यूनतम तापमान रिकार्ड किए जाने की घटनाएं सामने आई तो इनकी जानकारी भी बहुत लोगों को नाही हो पाई. जबकि कहीं भी तापमान में वृध्दि होती है तो संचार माध्यमों की सुर्खी बन जाती है. जाहिर है. जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग का प्रचार बढता गया, ग्लोबल कूलिंग की समस्या के प्रति लोगों का ध्यान हटता गया.
सवाल यह है कि यह स्थिती अचानक कैसे आई कि ग्लोबल कूलिंग की जगह ग्लोबल वार्मिंग ने ले ली. ऐसा माना जाता है कि ग्लोबल वार्मिंग की धुंआधार मार्केटिंग करके इसे अरबों डाॅलर का उद्योग बना दिया गया है, जिसमें हजारों नौकरियाॅं हैं, स्वयंसेवी संगठनों के लिए लाखों डाॅलर की फंडिग हैं, शोधकर्ताओं-वैज्ञानिकों के लिए अनेक सम्मान-पुरस्कार हैं, किसी भी शोषणा के लिए व्यापक मीडिया कवरेज है. बडी-बडी बहुराष्ट्रीय कंपानियो के हित इससे जुडे हैं. ऐसे मेे ग्लोबल वार्मिंग पर कोई क्यों ध्यान देने लगा.
वैज्ञानिक समय≤ पर धरती पर हिमयुग के आगमन की चेतावनी देते आए हैं. लेकिन, अभी तक इसका संभावित समय नहीं बताया गया था. अब्दुसाम्तोव ने ग्लोबल कूलिंग की शुरूआत का जो समय दिया है, वह इतना करीब आ चुका है कि समस्या से निपटने की तैयारियों के लिए अपर्याप्त है.
इससे पहले सत्रहवीं सदी मे यूरोप एक छोटे हिमयुग का अनुभव कर चुका है. न्यूयार्कवासी एक समय मैनहट्टन से स्टेटेन द्वीप तक पहॅुंचने के लिए एक जमी हुई बर्फ की सतह का उपयोग कर चुके हैं, करीब दो सौ साल पहले भी तापमान में भारी कमी ने उपजाऊ ग्रीनलैंड को बंजर आर्कटिक मे तब्दील कर दिया था.
कुछ साल पहले भी वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी थी कि पृथ्वी पर सूर्य का पूरा प्रकाश नहीं पहुॅंच रहा है. इसके रास्ते में धूल, धुंआ, इलेक्ट्राॅनिक उपकरणोें से उत्सर्जित गैसों तथा ग्रीन हाउस गैसों आदि ने मिलकर एक ऐसा अवरोध पैदा कर दिया है, जो सूरज की रोशनी को पृथ्वी तक पहुॅंचने में बाधक बन रहा है. पृथ्वी पर जीवन के संचालन में सूर्य की महत्वपूर्ण भूमिका किसी से नहीं छिपी है. इसके बावजूद इस स्थिति से निपटने के लिए कोई बहुत कारगर उपाय किए गए हों, ऐसा जानकारी मे नहीं आया है. धरती के तपामान के कम होने के पीछे यह भी एक वजह हो सकती है. डाॅ. अब्दुसाम्तोव का यह भी सुझाव है कि ग्लोबल वार्मिंग के संबंध में अपनाए जा रहे क्योटो सुझावों को तुरंत रोककर ग्लोबल कूलिंग से निपटने की तैयारियां शुरू कर देनी चाहिएं. मगर, उनकी इस बात को बहुत समर्थन हासिल नहीं है.

(यह भी पढ़ें : http://www.zindaginext.com/modified-human-in-ice-age/ & http://www.zindaginext.com/ice-age-coming/ )

Filed in: Editor's Notes, Planet Next

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