पागलपंती भी जरूरी है

sandeep-bएक शीतल पेय के विज्ञापन की इस पंचलाइन से पूरी तरह सहमत होना शायद आपको तर्कसंगत न लगे, लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि ज्ञान के प्रभुत्व वाले इस युग में मूर्खताओं की अपनी एक खास जगह और अहमियत है. बेशक आज  का  दिन दुनिया भर में मूर्ख दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन सच तो यह है कि हम पूरे साल ही किसी न किसी रूप में मूर्ख बनने और बनाने में लिप्त रहते हैं. कभी जानबूझकर तो कभी अनजाने में. कई बार हमें मूर्ख बन जाने का एहसास होता है और कई बार नहीं भी हो पाता. अमेरिका दुनिया को बेवकूफ बनाता है, नेता जनता को मूर्ख बनाता है, फिल्में दर्शकों को. पहले अभिभावक बच्चों को दस-पंद्रह साल की उम्र तक बेवकूफ बनाने में सफल कहे जा सकते थे, अब दस-पंद्रह साल के बच्चे मां-बाप को बेवकूफ बनाते देखे जा सकते हैं.
सवाल यह उठता है कि मूर्खताएं जीवन में क्यों जरूरी हैं? इसका जवाब आपको अपने अनुभवों के खजाने में कहीं ना कहीं मिल ही जाएगा. यदि आप याद करने बैठें तो आपको अपनी बुद्धिमानी से ज्यादा बेवकूफी से जुड़ी घटनाएं याद आएंगी. खासकर इंसान के बचपन का तो एक बड़ा हिस्सा बेवकूफियों के ही बीच बीतता है. मूर्खता और ज्ञान के बीच जो भेद हैं, उन्हें समझने के लिए बहुत ज्यादा मगजमारी की जरूरत नहीं होती. सबसे बड़ा फर्क यह है कि मूर्खताओं को आप कहीं से सीखते नहीं, बल्कि ये स्वाभाविक रूप से आपके जीवन में आती हैं, जबकि ज्ञानी बनने के लिए आपको जमाने भर के जतन करने पड़ते हैं. मूर्खताएं आपको बिना किसी श्रम के जिंदगी के सबक सिखाती हैं. आप सारी जिंदगी ज्ञान हासिल करते रहें, तब भी एक अधूरापन हमेशा आपको खलता रहेगा. जबकि मूर्खता का हर प्रयास अपने आप में सम्पूर्ण होता है.
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मूर्खता एक प्रकार से अनुभवजनित ज्ञान प्राप्त करने का शार्टकट है. मूर्खताएं जीवन में इसलिए भी जरूरी हैं, क्योंकि ये हमें विनम्र बनाती हैं. जबकि ज्ञान हमें विद्वान होने के दंभ से भरता है. मूर्खताएं हमारे जीवन में हल्कापन लाती हैं. जबकि ज्ञान का बोझ हमें तनाव देता है और हमारी सहजता छीन लेता है. हम अपनी मूर्खताओं पर कभी भी हंस सकते हैं, लेकिन हमारा ज्ञान हमारे लिए जहां भर कि चिंताएं लेकर आता है. कभी हम मुद्रास्फीति को लेकर चिंतित होते हैं, कभी वैश्विक मंदी को लेकर, कभी जीवन में गिरते मूल्यों को लेकर तो कभी दस , बीस , पचास या पचास हज़ार साल बाद होने वाली प्रलय की आशंकाओं के बारे में सोचकर… लेकिन, मूर्खता हर चीज के प्रति बेफिक्र ही बनी रहती है.
फ्रांसीसी फिल्मकार क्लाउड शैब्रोल का कहना है कि मूर्खता, बुद्धिमत्ता से ज्यादा आकर्षक होती हैं. बुद्धिमानी की अपनी सीमाएं हो सकती हैं, लेकिन मूर्खता की नहीं. बात सही है, क्योंकि  बुद्धिमत्ता का परिचय देने के लिए हमें अवसर की प्रतीक्षा करनी पडती है, जबकि खुद को मूर्ख साबित करने के लिए आप किसी भी वक्त, किसी भी काम में बहुत आसानी से अपनी मूर्खता प्रदर्शित कर सकते हैं.
मूर्खताएं जीवन में इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि ये हमारे मनुष्य होने का प्रमाण हैं. क्योंकि पुरानी कहावत है कि गलतियां इनसान से ही होती है. इसलिए मूर्खताओं पर शर्मिंदा होने की बजाए इनके सकारात्मक पक्ष पर ध्यान दिया जाना चाहिए. हां, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दूसरो को मूर्ख बनाने को एक कारोबार के रूप में संचालित किए जाने के प्रयासों का, चाहे वे किसी भी स्तर पर किसी भी रूप में संचालित किए जाने के प्रयासों का, चाहे वे किसी भी स्तर पर किसी भी रूप में हों, हर हाल में विरोध होना चाहिए. और  जब हम अपने मनोरंजन के लिए किसी को मूर्ख बनाने की फिराक में हों, तो यह ध्यान जरूर रखा जान चाहिए कि हमारा परिहास, परिहास ही रहे, उपहास न बनने पाए.
मशहूर कवि – गीतकार निदा फाजली की एक गजल की पंक्तियां हैं – दो और दो का जोड़ हमेशा, चार कहां होता है …. सोच – समझ वालों को थोड़ी  नादानी दे मौला. इतिहास गवाह है कि लगभग हर जीनियस, अपने शुरूआती दौर में मूर्ख ही कहलाया गया है. लेकिन, जैसे – जैसे ज्ञान हमारी जिंदगी में अतिक्रमण करता जाता है, मूर्खता की जगह सिकुड़ती जाती है और हम एक चलते – फिरते नॉलिज  बैंक  में तब्दील होते जाते हैं. शायद इसीलिए निदा ईश्वर से समझदारों को नादानी देने की प्रार्थना करते हैं ताकि हमारे भीतर का मनुष्य बना – बचा रहे.
संदीप अग्रवाल 
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