एवरेस्ट कितना ऊंचा ?

बीते हफ्ते चीन के पर्वतारोहियों की 8 सदस्यीय टीम ने करीब ढाई घंटे की मशक्कत के बाद माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई नाप ली है. लेकिन, उसकी गणना के हिसाब से यह ऊंचाई अभी तक अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता प्राप्त ऊंचाई से करीब चार मीटर कम है. स्वयं चीन ने भी इससे पहले 27 मई 1975 को उत्तरी ढलान से माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर माउंट एवरेस्ट की ऊँचाई 8848.13 मीटर मापी थी, जिसे उसने इस बार की गणना में 8844.43 मीटर पाया है. 

Image Courtesy : Bri Schneiter (Pexels)

अभी तक चीन छह बार एवरेस्ट की ऊंचाई नापने का अभियान चला चुका है. इस बार की गणना के बारे में उसका दावा है कि यह अभी तक की सबसे सटीक गणना है, जिसमें ऊँचाई मापने के दौरान कई इनोवेटिव टेकनीक्स का प्रयोग किया गया और मापने की उच्च परिशुद्धता को सुनिश्चित करने के लिए पहली बार पेइतोउ उपग्रह का प्रयोग किया गया. साथ ही चीन में स्वनिर्मित उपकरणों के माध्यम से चोटी पर बर्फ की गहराई और गुरुत्वाकर्षण को भी नापा गया, जो पहली बार है. 
1856 में जब पहली बार एवरेस्ट की ऊँचाई मापी गई थी तभी से इसकी लंबाई को लेकर विवाद हैं. भारत, चीन और नेपाल समय—समय पर एवरेस्ट की ऊंचाई नापने का प्रयास करते रहते हैं. इसकी जो सर्वमान्य ऊंचाई है, वह समुद्र की सतह से 8848 मीटर मानी जाती है. यह इसे लेकर नेपाल और चीन में काफी मतभेद रहे हैं. चीन का तर्क रहा है कि माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई ‘रॉक हाइट’ के अनुसार मापी जानी चाहिए, यानी जहां तक चट्टानें हैं वहीं तक की ऊंचाई मापी जानी चाहिए. जबकि नेपाल हमेशा से ही बर्फ़ की ऊंचाई को भी इसमें जोड़ता रहा है. हालंकि कुछ साल पहले, दोनों में एक सहमति बन चुकी है. ज्ञातव्य है कि माउंट एवरेस्ट नेपाल और चीन की सीमा पर है और यहाँ पहुँचने के लिए चीन या नेपाल के रास्ते ही जाया जा सकता है.

भारत ने एवरेस्ट की ऊंचाई वर्ष 1955 में 8,848 मीटर मापी थी जिस पर सभी की ओर से एक सामान्य सहमति थी. जबकि अमेरिका एवरेस्ट की ऊँचाई 8,850 मीटर मानता है. 1999 के मई महीने में एक अमेरिकी खोजकर्ता ने जीपीएस तकनीक का इस्तेमाल कर एवरेस्ट की ऊंचाई 8,850 मीटर मापी थी. इसी लंबाई को अमेरिका की नेशनल ज्योग्राफ़िक सोसायटी इसी ऊंचाई को स्वीकार व इस्तेमाल करती है. हांलाकि नेपाल इसे भी स्वीकार नहीं करता.
2015 में नेपाल में एक भयंकर भूकंंप आया था. वैज्ञानिकों को शक हुआ कि इससे एवरेस्ट सिकुड़ रहा है. इसके बाद 2017 में भारत ने इसकी ऊंचाई दोबारा नापने का फैसला किया. भूवैज्ञानिकों का मानना है कि अब तक जो लंबाई मापी गई है वह ग़लत हो सकती है. उनका दावा है कि भारत की धरती के नीचे जो प्लेटें हैं वो चीन और नेपाल की प्लेटों को धक्का दे रही हैं जिससे एवरेस्ट की ऊंचाई हर साल दो सेंटीमीटर की दर से बढ़ रही है.

जाहिर है कि अभी भी कोई भी दावा ऐसा नहीं है, जिसे अंतिम माना जा सके. दरअसल प्रकृति अपने आप में इतनी व्यापक और रहस्यमय है कि उसकी वास्तविक थाह पाने के लिए मानव मेधा अभी बहुत छोटी है. इसलिए, जो उपलब्ध ज्ञान है, उसे ही सत्य मानकर चलते रहना ही बुद्धिमत्ता है. प्रयास जारी रखिए, आप स्थापित सत्य को छोटा कर सकते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि आपका सत्य ही अंतिम हो, कल कोई और नई खोज उसे झूठा साबित कर सकती है.

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