दुनिया इंसानों के बिना.. .

अक्सर हम मनुष्य को अपने मानव होने पर बहुत गर्व होता है. यहाँ तक कि हम स्वयं को प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना कहने से भी नहीं चूकते. लेकिन, वास्तविकता यह है कि हमें रचते समय प्रकृति को यदि जरा सा भी अंदाजा रहा होता कि उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना, अपने लालच, खुदगर्जी और अहंकार की वजह से उसके साथ, उसकी दूसरी रचनाओं के साथ क्या सलूक करने वाली है, तो शायद वह हमें रचने से पहले सौ बार सोचती. wwu_FotoSketcher आईए, एक जायजा लेते हैं कि हमारे न होने से किस तेजी से मदर नेचर वापस अपनी पुराने खुशनुमा दिनों की ओर लौटना शुरू कर देगी.यह दिलचस्प आकलन हमारी आंखें खोलने के लिए काफी है कि हमने अपनी जन्मदात्री प्रकृति और इसके पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाया है.. .फर्ज कीजिए, हम इसी वक्त इस दुनिया से मनुष्य जाति का नामोनिशान मिट जाता है.. . तत्काल प्रभाव जीव-ंजंतुओं और वनस्पतियों की ऐसी प्रजातियां, जो नष्ट होने के करीब आ पहुंची हैं, तुरंत उनकी दशा में सुधार आरंभ हो जाएगा. 24 से 48 घंटे के भीतर प्रकाश प्रदूषण का अंत. तीन माह में  वायु प्रदूषण (नाइट्रोजन और सल्फर आक्साइड) में कमी आएगी. दस साल के भीतर वायुमंडल से मीथेन गैस खत्म हो जाएगी. बीस साल के भीतर गांव की सड़कें और जीएम फसलें गायब हो जाएंगी. पचास साल के भीतर ताजे पानी से नाइट्रेट और फॉस्फेट्स गायब होने से मछलियों की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार होगा. पचास से सौ साल के भीतर शहरी सड़कें और बेतहाशा इमारतें खत्म हो जाएंगी. सौ साल बाद लकड़ी से बनी इमारतों का क्षरण. सौ से दो सौ साल के भीतर सभी पुलों का खात्मा दो सौ साल के भीतर धातु और कांच की बनी इमारतें धराशायी हो जाएंगी और अमेरिका की खाद्यान्न पट्टी घास के विशाल मैदान की स्थिति में वापस आ जाएगी. ढाई सौ साल के भीतर सभी बाँध धराशायी पाँच सौ साल के भीतर मूंगे की चट्टानों का पुननिर्माण पाँच सौ से एक हजार साल के भीतर धरती पर फैला जैविक कचरे का अधिकतर हिस्सा नष्ट हो जाएगा. एक हजार साल बाद ईंट-ंपत्थर और कंक्रीट से बनी अधिकतर इमारतें खत्म हो जाएंगी. वायुमंडल में व्याप्त कार्बन डाइआक्साइड, पूर्व औद्योगिक स्तर पर लौट आएगी. पचास हजार साल के भीतर पृथ्वी पर से अधिकतर कांच और प्लास्टिक घट जाएगा. पचास हजार साल बाद पृथ्वी पर मनुष्य की मौजूदगी के साक्ष्य कुछेक पुरातात्विक निशानियां से ही पहचाने जा सकेंगे. इसके बावजूद कुछ मानवनिर्मित रसायनों को पूरी तरह खत्म होने में दो लाख साल लग सकते हैं और परमाणु कचरा करीब बीस लाख सालों तक घातक बना रह सकता है.

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