भविष्य की भाषा

दोस्तों,
भाषा और लिपि ऐसे विषय हैं, जिस पर बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे गए हैं, लिखे जा रहे हैं और लिखे जा सकते हैं. इसलिए यहाँ बहुत विस्तार में न जाते हुए, सीधे मूल मुद्दे पर आते हैं, यह है कुछ ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज द्वारा स्टुडेंट्स के कोर्स में इमोजी को भी शामिल किए जाने का. खबर है कि किंग्स कॉलेज, एडिनबर्ग और कार्डिफ समेत सभी यूनिवर्सिटी के भाषा, मार्केटिंग, मनोविज्ञान और राजनीति के पाठ्यक्रम में इमोजी और कार्टून को शामिल किया गया है.

सोशल मीडिया के विस्तार ने इमोजी को एक वैश्विक लोकप्रियता दी है और इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. डिजीटल संवाद में भावनाओं को व्यक्त करने के लिए 90 करोड़ लोग रोजाना शब्दों से ज्यादा इमोजी को तरजीह दे रहे हैं. एक अनुमान के अनुसार इस समय दुनिया भर में तीन हजार से ज्यादा इमोजी प्रचलन में हैं. यानी दस साल पहले प्रचलित 625 इमोजी के मुकाबले करीब पाँच गुना ज्यादा. यह अलग बात है कि हममें से ज्यादातर लोग दुःख, खुशी, आश्चर्य, गुस्से आदि के अलावा 40-50 इमोजी से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते और ऐसे लोग बहुत कम होंगे, जिन्हें सौ से ज्यादा इमोजी का मतलब भी पता होगा. लेकिन, यह स्थिति बदल रही है. इमोजी में लोगों की दिलचस्पी तो बढ़ ही रही है, साथ ही उनकी विविधता में भी इजाफा हो रहा है. अलग-अलग देशों में उत्साही युवा अपनी-अपनी स्थानीय जरूरतों के हिसाब से इमोजी रच रहे हैं.
शायद यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे भविष्य की भाषा मान रहे हैं. लेकिन, सवाल यह है कि इमोजी के प्रति इस बढ़ती दीवानगी को लेकर बड़े पैमाने पर चिंताएं भी व्यक्त की जाने लगी हैं. इसके अनेक दुष्प्रभाव सामने आने लगे हैं, जैसे कि भाषा और ग्रामर पर बच्चों की पकड़ कमजोर हो रही है. उनका शब्द भंडार घट रहा है.
भारत में खुशी के आंसू वाला इमोजी सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. इसी इमोजी को 2015 में आक्सफोर्ड ने अपनी डिक्शनरी में वर्ड आॅफ द इयर के रूप में शामिल किया था.
जहाँ तक इनके प्रभाव की बात है तो कई सारे मामलों में इनका इस्तेमाल आपकी मूल भावनाओं को उतनी गंभीरता से सम्प्रेषित नहीं कर पाता, जितना कि शब्द कर सकते हैं. कई जगह तो बड़ी हास्यास्पद स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है. लेकिन, अब हम संचार के उस दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जहाँ अपनी बात कहने के लिए परंपरागत शब्द निर्भरता घट रही है और भावनाओं की अभिव्यक्ति में औपचारिकता बढ़ रही है. ऐसे में इमोजी आपके असमंजस को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
और यह भी गौर करने लायक बात है कि इमोजी की भाषा अभी अपने शैशव काल में है. किसी भी भाषा को विकसित होने में दशकों लग जाते हैं. इमोजी ने तो बहुत कम समय में एक लंबी दूरी तय कर ली है. हो सकता है कि कुछ साल में हम सब अपना सारा लिखित संवाद इमोजी के जरिए ही करते नजर आएं.
संदीप अग्रवाल

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