बायोपिक गर्ल्स

पिछले एक दशक से लगातार, मशहूर हस्तियों, खासकर खिलाड़ियों के जीवन पर आधारित बायोपिक मूवीज बनाई जा रही हैं. हर साल ऐसी करीब आधा दर्जन मूवीज रिलीज होती हैं. लेकिन, देखने में यह आया है कि ऐसी हस्तियों में पुरुषों का ही दबदबा बना रहा है.

महिलाओं के हिस्से में पूर्णा, मैरी काॅम, हसीना पारकर, नीरजा, द डर्टी पिक्चर, मणिकर्णिका, स्काई इज पिंक, साँड की आँख जैसी मूवीज आईं तो, लेकिन इनकी तादाद उंगलियों पर गिने जाने लायक ही कही जा सकती है.

यह साल यानी 2020, इस दिशा में एक नया मोड़ साबित हुआ है. एसिड विक्टिम लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन से प्रेरित छपाक (दीपिका पादुकोण) और मलाला युसूफजई पर आधारित गुलमकई (रीम शेख) जैसी फिल्मों से शुरू हुआ यह साल ऐसी कम से कम एक दर्जन फिल्मों की सौगात देने जा रहा है, जो यह साबित करेंगी कि आने वाले दिनों में महिला किरदारों पर आधारित बायोपिक संख्या के मामले में अपने मेल काउंटरपार्ट्स पर भारी पड़ने वाले हैं.

इन बायोपिक में सबसे ज्यादा उत्सुकता दर्शकों में बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल की बायोपिक साइना को लेकर है, जिसमें शीर्षक भूमिका परिणीति चोपड़ा ने निभाई है. इसके अलावा इस बरस महिला खिलाड़ियों के जीवन पर जो फिल्में देखने को मिल सकती हैं, उनमें शामिल हैं एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला दिव्यांग पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा की प्रेरणात्मक कहानी पर बेस्ड बायोपिक ( आलिया भट्ट), दो फार्मर महिला क्रिकेट टीम कप्तानं, मीताली राज की बायोपिक ( तापसी पन्नू) और झूलन गोस्वामी की बायोपिक ( अनुष्का शर्मा).

लेकिन, अच्छी बात यह है कि स्पोर्ट्स के अलावा दूसरे क्षेत्रों में नाम कमाने वाली महिलाओं पर भी फिल्ममेकर्स काफी तवज्जो दे रहे हैं. इनमें प्रमुख हैं, विश्वविख्यात मैथमेटेशियन शकुंतला देवी की इसी नाम वाली बायोपिक ( विद्या बालान), पहली फीमेल एयरफोर्स पायलट गुंजन सक्सेना (जाह्नवी कपूर), जयललिता की बायोपिक थालावी (कंगना राणावत) और कभी ओशो की घनिष्ठ सहयोगी रही मा आनंद शीला के जीवन पर केंद्रित बायोपिक ( प्रियंका चोपड़ा) जैसी फिल्में प्रमुख हैं.

बाॅलीवुड का बायोपिक प्रेम नया नहीं है, लेकिन बीते कुछ सालों में यह दीवानगी में बदल चुका है. यह एक अलग बात है कि पहले जहाँ सफलता की दृष्टि से भाग मिल्खा भाग, चकदे इंडिया, एम.एस.धोनी, सुपर 30, तानाजी, संजू, पैडमैन जैसे पुरुष प्रधान फिल्मों को ज्यादा सुरक्षित माना जाता रहा है. लेकिन मैरी काॅम, नीरजा, दंगल, द डर्टी पिक्चर जैसी सफलताएं भी हैं, जिन्होंने हमारे फिल्ममेकर्स को इस दिशा में आगे बढ़ने का हौसला दिया है.

शायद यही वजह है कि आज अगर हम ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट शूटर अभिनव बिंद्रा बायोपिक ( हर्षवर्द्धन कपूर), फुटबाॅल कोच सैयद अब्दुल रहीम के जीवन पर बेस्ड मैदान (अजय देवगन) जैसी फिल्मों से जुड़ी खबरें पढ़ रहे हैं तो महिला किरदारों पर बन रही फिल्मों की संख्या इससे दोगुनी है. वूमैन पाॅवर को सलाम !

– श्वेता अग्रवाल

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