आधार की मार

IMG_20160507_160110करीब सात साल पहले, जब देश में आधार या यूआईडी का आगाज हुआ था तो यह एक बेहद क्रांतिकारी और दूरगामी फायदों वाली पहल मानी जा रही थी. गैस सिलेंडरों और दूसरी चीजों में मिलने वाली सरकारी सब्सिडी की जो अंधी लूट जारी थी, उसमें इसके त्वरित फायदे भी देखने को मिले. लेकिन, उसके बाद जिस तरह से इसे लगातार कोई भी सेवा या फायदे पाने की शर्त में बदला जा रहा है, उसने देश की जनता में एक ऐसी बेचैनी पैदा कर दी है, जिससे बचा जा सकता था.

जनाकांक्षाओं के विशाल ज्वार पर सवार होकर सत्ता में आई एक अतिलोकप्रिय सरकार को अप्रिय फैसले लागू करने में थोड़े संयम और समझदारी से काम लेना चाहिए था.67 सालों में समाज और राजनीति में छाई जिस गंदगी को साफ करने के लिए वह जिन कड़वी गोलियों को जरूरी बता रही है, फिलहाल तो उनके फायदे कम और साइड इफेक्ट्स ज्यादा देखने में आ रहे हैं.

आधार लिंकिंग को लेकर केंद्र सरकार का व्यवहार सनक की हदों को पार करता जा रहा है. आधार धारकों को त्रस्त और आक्रांत करने का यह सिलसिला कब तक जारी रहेगा, कहा नहीं जा सकता. एक आदमी के पास कई बैंक अकाउंट, बीमा पाॅलिसी या टेलीफोन नंबर हो सकते हैं. लिंकेज की जिम्मेदारी इन सर्विस प्रोवाइडर की होनी चाहिए, हो यह रहा है कि हर जगह उपभोक्ता को दौड़ना पड़ रहा है. जहाँ आॅनलाइन आॅप्शन एवेलेबल है, वहाँ भी हो ये रहा है कि आधार लिंक करने का प्रोसेस पूरा होने के बाद भी कोई ऐसी सूचना सर्विस प्रोवाइडर नहीं दे रहे हैं कि उपभोक्ता का आधार उसके खाते से लिंक हो गया है, उल्टा उसे खाता या नंबर बंद होने की चेतावनियाँ मिलना जारी रहता है.

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मेरा सुझाव यह है कि सरकार आधार कार्ड धारक के आधार अकाउंट में ही यह सुविधा उपलब्ध कराए कि वे यूज किए जा रहे फोन नंबर, बैंक खाता नंबर, बीमा पाॅलिसी नंबर, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट या और भी दूसरे नंबर उसमें एंटर कर सकें और फिर वे खुद ही आधार नंबर से लिंक हो जाएं. तकनीक की अपार संभावनाओं के देखते हुए यह कोई बहुत मुश्किल काम नहीं लगता. जो लोग आॅनलाइन ऐसा करने में समर्थ नहीं हैं, उनके लिए आधार कार्ड बनाने वाले सेंटर्स पर यह सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है. इसमें डाकघरों के विशाल नेटवर्क का यूज किया जा सकता है.

सरकार अगर उत्कृष्ट सेवा प्रदान करने की बजाए रिंग मास्टर की भूमिका अपना ले तो इसे एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवहार की संज्ञा नहीं दी जा सकती. जनता को अनुशासित करने के लिए उसे एक अच्छा जीवन, अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार देना ज्यादा जरूरी है, न कि उस पर तरह-तरह के चाबुक आजमाना. आधार का उपयोग भी एक चाबुक की तरह किया जा रहा है, इससे जितना जल्दी परहेज बरता जा सके, उतना ही बेहतर होगा.

संदीप अग्रवाल
एडिटर-इन-चीफ

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