आप किसके साथ हैं

सोशल मीडिया की दुनिया अगर आभासी न होकर वास्तविक होती तो शायद उसमें हर समय कहीं न कहीं, कोई न कोई हंगामा बरपा होता. गनीमत है कि यह सारी जुबानी जंग अभी फेसबुक और ट्विटर तक ​ही सीमित है. जब भी इसका असर बाहरी दुनिया पर पड़ता है, तब पता चलता है कि हम किस ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे हैं.

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद देश में जो माहौल बना है, उसमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जो किया सो किया, लेकिन सोशल मीडिया ने बहुत बेशर्म और बेरहमी से अपने काम को अंजाम दिया है. 90 फीसदी पोस्ट या ट्वीट या तो रिया के साथ हुए ‘अन्याय’ को लेकर कलप रहे हैं या कंगना के साथ हुए ‘अत्याचार’ पे सियापा कर रहे हैं. दोनों पक्ष एक दूसरे को जमकर गरिया रहे हैं. कोई नशे में डूबी कंगना की पार्टी वाली फोटो चस्पां कर रहा है, कोई महेश भट्ट की गोदी में बैठी रिया की.

अब तक जो दस फीसदी रिंग के बाहर बैठकर इस नूरा कुश्ती और खुद का तटस्थ कहलाने का लुत्फ ले रहे थे, अब वे भी दोनों पक्षों के निशाने पर आ गए हैं. उन्हें इस बात के लिए गरिया जा रहा है कि नियमित रूप से बोलते हैं तो इस ‘राष्ट्रीय महत्व’ के मुद्दे पर क्या उनके मुँह में दही जम गया है. अमिताभ बच्चन इसके सबसे अहम शिकार हैं. उनसे जवाब माँगा जा रहा है कि वे चुप क्यों हैं? मतलब तटस्थ रहकर भी आप गालियाँ खाने से नहीं बच सकते… बल्कि अगर आप तटस्थ हैं तो आपको पांडवों और कौरवों, दोनों की गालियाँ खानी पड़ेंगी. इसलिए कोई एक खेमा चुन लीजिए और खुलकर बताइए कि आप किसके साथ हैं… कम से कम तब वही पक्ष आपको गाली देगा, जो आपके लिए विपक्ष है.

सोशल मीडिया एक ऐसे स्टेडियम में तब्दील हो चुका है, जिसमें दर्शकों के लिए कोई जगह नहीं है. अगर आप स्टेडियम में हैं तो आपको किसी न किसी का पक्ष लेते हुए खेल में शरीक होना ही पड़ेगा. वर्ना कंदराओं में जाकर ध्यान लगाने का विकल्प आपके सामने खुला है, जिसे बहुत सारे दूरदर्शी यूजर्स बहुत पहले अपना चुके हैं.

लब्बे—लुआब यह है कि खामोशी अब बचाव की गारंटी नहीं है , और बोलना तो हमेशा से ही नहीं था.

Filed in: Editor's Notes, Netopia

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