सच दिखा क्या कहीं?

फेसबुक और इंस्टा पर टीवी चैनलों की भीड़ से घिरी रिया चक्रवर्ती को देखकर आप भी हलकान हुए होंगे. क्योंकि आप यह तो कतई नहीं मानते होंगे कि सारा सच रिया अपने पेट में छिपाए हुए है, जिसे माइकों से खोदकर निकालने के लिए कैमरों का यह हुजूम वहाँ उमड़ा होगा. तो फिर किस लिए? देश को हिला देने वाले एक मामले में एक अदना सी एक्ट्रेस इतनी इम्पोर्टेंट कैसे हो सकती है कि रिपोर्टर जाँच करने वालों की बजाए उसके पास पहुँचते हैं. आखिर क्या जानना चाहते हैं वे उससे?

image courtesy: Social media websites

अगर आपने जुम्मन मियाँ का पाजामा नाम का किस्सा सुना है, तो आपको याद होगा कि किस तरह जुम्मन मियाँ अपने पाजामे को आठ अंगुल छोटा करने के लिए अपनी अम्मी, बहन, बीवी और बेटी से मनुहार करते हैं और सब अपनी मशरूफियत के चलते उन्हें टरका देती हैं. बाद में हर औरत जब—जब काम से फारिग होकर फुरसत में आती है तो उसे जुम्मन मियाँ की फरमाइश याद आती है और वह पायजामे को आठ अंगुल छोटा करती जाती है. आखिरकार, जुम्मन मियाँ के हाथ में जब पाजामा आता है तो वह पाजामे की बजाए बरमूडा जैसी शक्ल अख्तियार कर चुका होता है.

जून के पहले हफ्ते में हुई सुशांत सिंह राजपूत की मौत का मामला कुछ ऐसे ही हालात में आ पहुँचा है. शुरू से ही इस मामले में नए—नए तड़के लगाए जा रहे हैं. टीवी चैनलों और सोशल मीडिया के रणबाँकुरों ने पूरे मामले को एक ऐसी शक्ल दे दी है कि असली सवाल नेपथ्य में चला गया है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत किसी साजिश का नतीजा थी या एक अवसादग्रस्त ​अभिनेता की आत्महत्या…

एक साथ इतने सारे एंगल, इससे पहले शायद ही किसी हादसे के साथ जोड़े गए हों. पहले इस मामले में बॉलीवुड के नेपोटिज्म और खानवाद का एंगल जोड़ा गया, कुछ दिनों बाद इसे एक युवा नेता और एक एक्स—गर्लफ्रेंड की साझा साजिश के रूप में प्रचारित किया जाने लगा, मुंबई पुलिस को नाकारा और पक्षपाती साबित करने की कोशिशों के बीच यह सीबीआई के हाथों सौंपे जाने की तैयारी की जाने लगी. तब तक एक लालची प्रेमिका द्वारा प्रेमी की दौलत हड़पते जाने की बात कही जाने लगी. हमेशा एक लड़ाका की छवि
बनाए रखने को आतुर कंगना राणावत ने एंट्री मारी तो मामला मुंबई का बाप कौन पर आ गया. सीबीआई ने कमान सँभाली तो इसमें नारकोटिक्स और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मुद्दे सामने आ गए…

इतने सारे एंगल के बीच असली सच कब सामने आएगा, और कभी आएगा भी या नहीं, कोई नहीं जानता. लेकिन, जिस तरह से फ्रेम के भीतर बार—बार नई—नई तस्वीर फिट की जाने की कोशिश की जा रही है, उसे देखते हुए यह संभावना कम ही है कि यह पूरी कवायद, किसी तार्किक या ​यकीन करने लायक अंजाम तक पहुँच सकेगी.

अखबारों की विश्वसनीयता अभी भी थोड़ी बची है, लेकिन लोकप्रियता कम हो रही है, टेलीविजन चैनल अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो चुके हैं और यह मान कर काम कर रहे हैं कि लोग उनकी खबरें जानकारी के लिए नहीं, बल्कि मनोंरंजन के लिए देख रहे हैं, और सोशल मीडिया तो कभी विश्वसनीय रहा ही नही… ऐसे में आप अगर यह आशा करते हैं कि इस रहस्य कथा का अंत कुछ अप्रत्याशित हो सकता है तो आप अव्यवहारिकता की हद तक आशावादी हैं.

Filed in: Editor's Notes

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