पहला पत्थर वो मारे…

पिछले कुछ सालों से, पोस्ट कोविड इरा में तो और भी ज्यादा, लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जब सोशल मीडिया मुद्दों को प्रभावित करने में न सिर्फ एक्टिव, बल्कि ओवर एक्टिव रोल प्ले कर रहा है.

पहली नजर में यह बड़ा आकर्षक​ विचार जान पड़ता है कि लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपने अधिकारों को लेकर इतना जागरूक हो चुके हैं कि कानों पर जूं न रेंगने देने के आदी तीनों स्तंभों को तुरंत कार्रवाई/कार्यवाही के लिए मजबूर कर देते हैं.

लेकिन, जब आप इन मुद्दों पर नजर डालेंगे तो अक्सर ये बड़े क्षुद्र किस्म के मुद्दे जान पड़ते हैं, जिनका आम जन की भलाई से कोई लेना—देना नहीं है. और गहराई से सोचेंगे तो देखेंगे ये सारी मुखरता किसी खास कम्युनिटी, कास्ट, आइडियोलॉजी या ग्रुप के लिए ही नजर आती है.

कभी लोग बीफ खाने या ना खाने के मुद्दे पर तलवारें भांजते हैं, कभी कथित गौरक्षकों या गौतस्करों के पक्ष में. कभी सुशांत या कंगना को राजपूताना आन—बान—शान का प्रतीक बना देते हैं, कभी रिया को बंगाली गौरव का… कभी इनके निशाने पर आमिर होते हैं, कभी स्वरा भास्कर, कभी गजेंद्र चौहान, कभी मुकेश खन्ना, कभी प्रकाश राज, कभी भट्ट, कभी शाहरुख तो कभी दीपिका. यही लोग हैं, जिन्होंने अमिताभ बच्चन जैसे वयोवृद्ध अभिनेता व उनके परिवार को पिछले पाँच महीनों से टारगेट करते हुए महानायक से खलनायक में बना दिया है. अब कॉलर ट्यून में कोरोनो से बचाव के बारे में उनके आह्वान की आलोचना की जा रही है, और कहा जा रहा है कि जो खुद को और परिवार को तो कोरोना से बचा नहीं पाया, वह दूसरों को नसीहत दे रहा है कि कोरोना से कैसे बचें.

इस कड़ी में ताजा मामला तनिष्क के उस एड का है, जिसमें एक हिंदू लड़की को मुस्लिम परिवार की बहू के रूप में सम्मान पाते दिखाया गया है. इस विज्ञापन और त​निष्क के प्रमोटर टाटा समूह के खिलाफ ऐसी जबर्दस्त ट्रॉलिंग हुई कि उत्पाद के बहिष्कार के भय से तनिष्क को अपना विज्ञापन ​वापस लेना पड़ा. इसे सिर्फ एक उदाहरण के तौर पर लें, क्योंकि यहाँ मुद्दा विज्ञापन के अच्छे या बुरे होने का नहीं है, बल्कि यह है कि हम एक नेटीजन के रूप में अपनी सारी ऊर्जा और प्रतिभा कैसे ऊलजुलूल चीजों में खपा रहे हैं. और छोटी—छोटी फतह हासिल कर खुद की पीठ थपथपाते हैं कि हमने गंदगी साफ कर दी है. लेकिन, यह कभी नहीं देख पाते कि हमने एक गंदगी साफ कर दी, पर साथ—साथ दूसरी गंदगी फैलाकर चले गए.

ऐसा भी नहीं कि हर बार ऐसा ही होता हो, चाइनीज सामान के बायकॉट, आरे कॉलोनी के वन विनाश को रोकने,कई बिछुड़ों को उनके परिवार से मिलाने से लेकर बाबा का ढाबा जैसे लोगों की जिंदगी संवारने जैसे अनेक अवसरों पर वाकई सोशल मीडिया के रणबांकुरों ने एक बेहतरीन भूमिका निभाई है, लेकिन ऐसे उदाहरण उंगलियों पर गिने जा सकते हैं. बाकी समय तो हम एक—दूसरे पर कीचड़ उछालने का मैराथन ही देखते रहते हैं.

कुल मिलाकर सोशल मीडिया एक ऐसे देश में तब्दील हो चुका है, जिसके नागरिक को ओलंपिक जीतने से ज्यादा एक गली—मोहल्ले वाला खेल जीतकर ज्यादा गर्वित होते हैं. लेकिन इस जीत के लिए जो उन्माद और शाब्दिक हिंसा वे अपनाए हुए हैं, वह एक खतरनाक और चिंताजनक भविष्य का सृजन कर रहा है. बेशक आप इसे रोक नहीं सकते, लेकिन धीमा जरूर कर सकते हैं… बशर्ते कि आप वक्त रहते तय कर सकें कि आपको इस समाज से ‘बाबा’ खोजने हैं या ‘गौरव’ के छद्म प्रतीकों का बोझ उठाते आगे बढ़ना है.

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