नारियल लाएगा अमरन

कभी आपने नारियल पानी पीते हुए सोचा है कि सीधे—ऊंचे नारियल के पेड़ से तोड़कर इस नारियल को आप तक पहुँचाने वाले व्यक्ति को कितनी मेहनत करनी पड़ती है? नारियल के पेड़ को देखिए, समझ जाएंगे कि उस पर चढ़ना कितना जोखिम भरा हो सकता है.

Rajesh Kannan Megalingam, an assistant professor at Amrita Vishwa Vidyapeetham University with Amaran . Rajesh and his team has been working on Amaran since 2014.

इस समस्या का समाधान बनकर आया है नारियल तोड़ने वाला रोबोट अमरन, जो मनुष्य के मुकाबले अधिक तेजी से और देर तक पेड़ पर चढ़ता रह सकता है और पेड़ से न सिर्फ नारियल, बल्कि पेड़ के पत्ते भी तोड़कर ला सकता है.

अमरन को पेड़ पर चढ़ाने के लिए एक घेरे के आकार की बॉडी डेवलप की गई है, जिसमें आठ पहिए लगे हैं, जिनकी मदद से यह पेड़ के चारों ओर घूम सकता है, चढ़—उतर सकता है. इसमें एक रो​बोटिक आर्म है, जिससे यह पेड़ पर लगे नारियल तोड़ता है. अमरन को जमीन पर खड़ा एक व्यक्ति वायरलेस कम्यूनि​केशन इंटरफेस के जरिए आॅपरेट करता है.

वैसे तो इसे अपने काम को अंजाम देने में इंसान के मुकाबले दो—तीन मिनट कम लगते हैं, लेकिन हर पेड़ की मोटाई और ऊंचाई अलग—अलग होने के कारण इसे हर बार सेट करना पड़ता है, जिसमें करीब पंद्रह मिनट लग जाते हैं. लेकिन जब इंसानी जीवन की सुरक्षा का प्रश्न हो तो यह देरी कोई बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती. वैसे भी अगर क्षमता को देखें तो जहाँ एक औसत इंसान एक दिन में 14 नारियल के पेड़ों के नारियल तोड़ सकता है, वहीं एक रोबोट की क्षमता दिन भर में 22 की है.

अमरन को डेवलप करने का काम 2014 से जारी था, अब जाकर इसमें कामयाबी हासिल हो सकी है. इसकी एक यूनिट बनाने में लगभग पौने दो लाख का खर्च आया है, लेकिन बड़ी संख्या में इसका उत्पादन किया जाए तो लागत एक लाख रुपए तक लाई जा सकती है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि केरल में लगभग सात हजार प्रशिक्षित नारियल—वृक्षारोही हैं, जबकि जरूरत करीब पचास हजार वृक्षारोहियों की है. आंध्र, तेलंगाना, तमिलनाडु जैसे दूसरे ​दक्षिण भारतीय राज्यों में भी कमोवेश यही स्थिति है. ऐसे में अमरन के व्यावसायिक उपयोग के लिए अपार संभावनाएं मौजूद हैं.

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